महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऋषय ऊचुः
द्वैपायनेन यत् प्रोक्तं पुराणं परमर्षिणा । सुरैर्ब्रह्मर्षिभिश्चैव श्रुत्वा यदभिपूजितम् ॥ १७ ॥ तस्याख्यानवरिष्ठस्य विचित्रपदपर्वणः । सूक्ष्मार्थन्याययुक्तस्य वेदार्थैर्भूषितस्य च ॥ १८ ॥ भारतस्येतिहासस्य पुण्यां ग्रन्थार्थसंयुताम् । संस्कारोपगतां ब्राह्मीं नानाशास्त्रोपबृंहिताम् ॥ १९ ॥ जनमेजयस्य यां राज्ञो वैशम्पायन उक्तवान् । यथावत् स ऋषिस्तुष्ट्या सत्रे द्वैपायनाज्ञया ॥ २० ॥ वेदैश्चतुर्भिः संयुक्तां व्यासस्याद्भुतकर्मणः । संहितां श्रोतुमिच्छामः पुण्यां पापभयापहाम् ॥ २१ ॥ ऋषियोंने कहा—उग्रश्रवाजी! परमर्षि श्रीकृष्ण-द्वैपायनने जिस प्राचीन इतिहासरूप पुराणका वर्णन किया है और देवताओं तथा ऋषियोंने अपने-अपने लोकमें श्रवण करके जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है, जो आख्यानोंमें सर्वश्रेष्ठ है, जिसका एक-एक पद, वाक्य एवं पर्व विचित्र शब्दविन्यास और रमणीय अर्थसे परिपूर्ण है, जिसमें आत्मा-परमात्माके सूक्ष्म स्वरूपका निर्णय एवं उनके अनुभवके लिये अनुकूल युक्तियाँ भरी हुई हैं और जो सम्पूर्ण वेदोंके तात्पर्यानुकूल अर्थसे अलंकृत है, उस भारत-इतिहासकी परम पुण्यमयी, ग्रन्थके गुप्त भावोंको स्पष्ट करनेवाली, पदों-वाक्योंकी व्युत्पत्तिसे युक्त, सब शास्त्रोंके अभिप्रायके अनुकूल और उनसे समर्थित जो अद्भुतकर्मा व्यासकी संहिता है, उसे हम सुनना चाहते हैं। अवश्य ही वह चारों वेदोंके अर्थोंसे भरी हुई तथा पुण्यस्वरूपा है। पाप और भयका नाश करनेवाली है। भगवान् वेदव्यासकी आज्ञासे राजा जनमेजयके यज्ञमें प्रसिद्ध ऋषि वैशम्पायनने आनन्दमें भरकर भलीभाँति इसका निरूपण किया है ॥ १७—२१ ॥
सौतिरुवाच
आद्यं पुरुषमीशानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम् । ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म व्यक्ताव्यक्तं सनातनम् ॥ २२ ॥ असच्च सदसच्चैव यद् विश्वं सदसत्परम् । परावराणां स्रष्टारं पुराणं परमव्ययम् ॥ २३ ॥ मङ्गल्यं मङ्गलं विष्णुं वरेण्यमनघं शुचिम् । नमस्कृत्य हृषीकेशं चराचरगुरुं हरिम् ॥ २४ ॥ महर्षेः पूजितस्येह सर्वलोकैर्महात्मनः । प्रवक्ष्यामि मतं पुण्यं व्यासस्याद्भुतकर्मणः ॥ २५ ॥