महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘फिर वे सभी कार्योंमें अभीष्ट प्रयोजनका निश्चय करनेके लिये हमसे सलाह पूछेंगे। उस समय हम उन्हें ऐसी बुद्धि देंगे, जिससे यज्ञ होगा ही नहीं’ ॥ १३ ॥
स नो बहुमतान् राजा बुद्ध्या बुद्धिमतां वरः ।
यज्ञार्थं प्रक्ष्यति व्यक्तं नेति वक्ष्यामहे वयम् ॥ १४ ॥
‘हम वहाँ बहुत विश्वस्त एवं सम्मानित होकर रहेंगे। अतः बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजा जनमेजय यज्ञके विषयमें हमारी सम्मति जाननेके लिये अवश्य पूछेंगे। उस समय हम स्पष्ट कह देंगे—‘यज्ञ न करो’ ॥ १४ ॥
दर्शयन्तो बहून् दोषान् प्रेत्य चेह च दारुणान् ।
हेतुभिः कारणैश्चैव यथा यज्ञो भवेन्न सः ॥ १५ ॥
‘हम युक्तियों और कारणोंद्वारा यह दिखायेंगे कि उस यज्ञसे इहलोक और परलोकमें अनेक भयंकर दोष प्राप्त होंगे; इससे वह यज्ञ होगा ही नहीं’ ॥ १५ ॥
अथवा य उपाध्यायः क्रतोस्तस्य भविष्यति ।
सर्पसत्रविधानज्ञो राजकार्यहिते रतः ॥ १६ ॥
तं गत्वा दशतां कश्चिद् भुजङ्गः स मरिष्यति ।
तस्मिन् मृते यज्ञकारे क्रतुः स न भविष्यति ॥ १७ ॥
‘अथवा जो उस यज्ञके आचार्य होंगे, जिन्हें सर्पयज्ञकी विधिका ज्ञान हो और जो राजाके कार्य एवं हितमें लगे रहते हों, उन्हें कोई सर्प जाकर डँस ले। फिर वे मर जायँगे। यज्ञ करानेवाले आचार्यके मर जानेपर वह यज्ञ अपने-आप बंद हो जायगा’ ॥ १६-१७ ॥
ये चान्ये सर्पसत्रज्ञा भविष्यन्त्यस्य चर्त्विजः ।
तांश्च सर्वान् दशिष्यामः कृतमेवं भविष्यति ॥ १८ ॥
‘आचार्यके सिवा दूसरे जो-जो ब्राह्मण सर्पयज्ञकी विधिको जानते होंगे और जनमेजयके यज्ञमें ऋत्विज् बननेवाले होंगे, उन सबको हम डँस लेंगे। इस प्रकार सारा काम बन जायगा’ ॥ १८ ॥
अपरे त्वब्रुवन् नागा धर्मात्मानो दयालवः ।
अबुद्धिरेशा भवतां ब्रह्महत्या न शोभनम् ॥ १९ ॥
यह सुनकर दूसरे धर्मात्मा और दयालु नागोंने कहा—‘ऐसा सोचना तुम्हारी मूर्खता है। ब्रह्म-हत्या कभी शुभकारक नहीं हो सकती’ ॥ १९ ॥
सम्यक्सद्धर्म्ममूला वै व्यसने शान्तिरुत्तमा ।
अधर्मोत्तरता नाम कृत्स्नं व्यापादयेज्जगत् ॥ २० ॥
‘आपत्तिकालमें शान्तिके लिये वही उपाय उत्तम माना गया है जो भलीभाँति श्रेष्ठ धर्मके अनुकूल किया गया हो। संकटसे बचनेके लिये उत्तरोत्तर अधर्म करनेकी प्रवृत्ति तो सम्पूर्ण जगत्का नाश कर डालेगी’ ॥ २० ॥
अपरे त्वब्रुवन् नागाः समिद्धं जातवेदसम् ।