महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवर्षैर्निर्वापयिष्यामो मेघा भूत्वा सविद्युतः ॥ २१ ॥ इसपर दूसरे नाग बोल उठे—‘जिस समय सर्पयज्ञके लिये अग्नि प्रज्वलित होगी, उस समय हम बिजलियोंसहित मेघ बनकर पानीकी वर्षाद्वारा उसे बुझा देंगे ॥ २१ ॥ स्रुग्भाण्डं निशि गत्वा च अपरे भुजगोत्तमाः । प्रमत्तानां हरन्त्वाशु विघ्न एवं भविष्यति ॥ २२ ॥ ‘दूसरे श्रेष्ठ नाग रातमें वहाँ जाकर असावधानीसे सोये हुए ऋत्विजोंके स्रुक्, स्रुवा और यज्ञपात्र आदि शीघ्र चुरा लावें। इस प्रकार उसमें विघ्न पड़ जायगा ॥ २२ ॥ यज्ञे वा भुजगास्तस्मिञ्छतशोऽथ सहस्रशः । जनान् दश्नन्तु वै सर्वे नैवं त्रासो भविष्यति ॥ २३ ॥ ‘अथवा उस यज्ञमें सभी सर्प जाकर सैकड़ों और हजारों मनुष्योंको डँस लें; ऐसा करनेसे हमारे लिये भय नहीं रहेगा ॥ २३ ॥ अथवा संस्कृतं भोज्यं दूषयन्तु भुजङ्गमाः । स्वेन मूत्रपुरीषेण सर्वभोज्यविनाशिना ॥ २४ ॥ ‘अथवा सर्पगण उस यज्ञके संस्कारयुक्त भोज्य पदार्थको अपने मल-मूत्रोंद्वारा, जो सब प्रकारकी भोजन-सामग्रीका विनाश करनेवाले हैं, दूषित कर दें’ ॥ २४ ॥ अपरे त्वब्रुवंस्तत्र ऋत्विजोऽस्य भवामहे । यज्ञविघ्नं करिष्यामो दीयतां दक्षिणा इति ॥ २५ ॥ वश्यतां च गतोऽसौ नः करिष्यति यथेप्सितम् । इसके बाद अन्य सर्पोंने कहा—‘हम उस यज्ञमें ऋत्विज् हो जायँगे और यह कहकर कि ‘हमें मुँहमाँगी दक्षिणा दो’ यज्ञमें विघ्न खड़ा कर देंगे। उस समय राजा हमारे वशमें पड़कर जैसी हमारी इच्छा होगी, वैसा करेंगे’ ॥ २५१/२ ॥ अपरे त्वब्रुवंस्तत्र जले प्रक्रीडितं नृपम् ॥ २६ ॥ गृह्मानीय बध्नीमः क्रतुरेवं भवेन्न सः । फिर अन्य नाग बोले—‘जब राजा जनमेजय जल-क्रीड़ा करते हों, उस समय उन्हें वहाँसे खींचकर हम अपने घर ले आवें और बाँधकर रख लें। ऐसा करनेसे वह यज्ञ होगा ही नहीं’— ॥ २६१/२ ॥ अपरे त्वब्रुवंस्तत्र नागाः पण्डितमानिनः ॥ २७ ॥ दशामस्तं प्रगृह्याशु कृतमेवं भविष्यति । छिन्नं मूलमनर्थानां मृते तस्मिन् भविष्यति ॥ २८ ॥ इसपर अपनेको पण्डित माननेवाले दूसरे नाग बोल उठे—‘हम जनमेजयको पकड़कर डँस लेंगे।’ ऐसा करनेसे तुरंत ही सब काम बन जायगा। उस राजाके मरनेपर हमारे लिये अनर्थोंकी जड़ ही कट जायगी ॥ २७-२८ ॥ एषा नो नैष्ठिकी बुद्धिः सर्वेषामीक्षणश्रवः ।