भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 351

मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके मीठे वचन बोलनेवाली नागकन्या जरत्कारुने वहाँ सोते हुए अग्निके समान तेजस्वी एवं तीव्र तपस्वी महर्षिसे मधुरवाणीमें यों कहा—'महाभाग! उठिये, सूर्यदेव अस्ताचलको जा रहे हैं।। २०-२१ ।।

संध्यामुपास्व भगवन्नपः स्पृष्ट्वा यतव्रतः ।
प्रादुष्कृताग्निहोत्रोऽयं मुहूर्तो रम्यदारुणः ।। २२ ।।
संध्या प्रवर्तते चेयं पश्चिमायां दिशि प्रभो ।
'भगवन्! आप संयमपूर्वक आचमन करके संध्योपासन कीजिये। अब अग्निहोत्रकी बेला हो रही है। यह मुहूर्त धर्मका साधन होनेके कारण अत्यन्त रमणीय जान पड़ता है। इसमें भूत आदि प्राणी विचरते हैं, अतः भयंकर भी है। प्रभो! पश्चिम दिशामें संध्या प्रकट हो रही है—उधरका आकाश लाल हो रहा है' ।। २२ १/२ ।।

एवमुक्तः स भगवान् जरत्कारुर्महातपाः ।। २३ ।।
भार्यां प्रस्फुरमाणौष्ठ इदं वचनमब्रवीत् ।
अवमानः प्रयुक्तोऽयं त्वया मम भुजङ्गमे ।। २४ ।।
नागकन्याके ऐसा कहनेपर महातपस्वी भगवान् जरत्कारु जाग उठे। उस समय क्रोधके मारे उनके होठ काँपने लगे। वे इस प्रकार बोले—'नागकन्ये! तूने मेरा यह अपमान किया है ।। २३-२४ ।।

समीपे ते न वत्स्यामि गमिष्यामि यथागतम् ।
शक्तिरस्ति न वामोरु मयि सुप्ते विभावसोः ।। २५ ।।
अस्तं गन्तुं यथाकालमिति मे हृदि वर्तते ।
न चाप्यवमतस्येह वासो रोचेत कस्यचित् ।। २६ ।।
किं पुनर्धर्मशीलस्य मम वा मद्विधस्य वा ।
'इसलिये अब मैं तेरे पास नहीं रहूँगा। जैसे आया हूँ, वैसे ही चला जाऊँगा। वामोरु! सूर्यमें इतनी शक्ति नहीं है कि मैं सोता रहूँ और वे अस्त हो जायें। यह मेरे हृदयमें निश्चय है। जिसका कहीं अपमान हो जाय ऐसे किसी भी पुरुषको वहाँ रहना अच्छा नहीं लगता। फिर मेरी अथवा मेरे-जैसे दूसरे धर्मशील पुरुषकी तो बात ही क्या है' ।। २५-२६ १/२ ।।

एवमुक्ता जरत्कारुर्भर्त्रा हृदयकम्पनम् ।। २७ ।।
अब्रवीद् भगिनी तत्र वासुकेः संनिवेशने ।
नावमानात् कृतवती तवाहं विप्र बोधनम् ।। २८ ।।
धर्मलोपो न ते विप्र स्यादित्येतन्मया कृतम् ।
उवाच भार्यामित्युक्तो जरत्कारुर्महातपाः ।। २९ ।।
ऋषिः कोपसमाविष्टस्त्यक्तुकामो भुजङ्गमाम् ।
न मे वागनृतं प्राह गमिष्येऽहं भुजङ्गमे ।। ३० ।।