महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 352, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंजब पतिने इस प्रकार हृदयमें कँपकँपी पैदा करनेवाली बात कही, तब उस घरमें स्थित वासुकिकी बहिन इस प्रकार बोली—'विप्रवर! मैंने अपमान करनेके लिये आपको नहीं जगाया था। आपके धर्मका लोप न हो जाय, यही ध्यानमें रखकर मैंने ऐसा किया है।' यह सुनकर क्रोधमें भरे हुए महातपस्वी ऋषि जरत्कारुने अपनी पत्नी नागकन्याको त्याग देनेकी इच्छा रखकर उससे कहा—'नागकन्ये! मैंने कभी झूठी बात मुँहसे नहीं निकाली है, अतः अवश्य जाऊँगा' ।। २७—३० ।।
समयो ह्येष मे पूर्वं त्वया सह मिथः कृतः ।
सुखमस्म्युषितो भद्रे ब्रूयास्त्वं भ्रातरं शुभे ।। ३१ ।।
इतो मयि गते भीरु गतः स भगवानिति ।
त्वं चापि मयि निष्क्रान्ते न शोकं कर्तुमर्हसि ।। ३२ ।।
‘मैंने तुम्हारे साथ आपसमें पहले ही ऐसी शर्त कर ली थी। भद्रे! मैं यहाँ बड़े सुखसे रहा हूँ। यहाँसे मेरे चले जानेके बाद अपने भाईसे कहना—'भगवान् जरत्कारु चले गये।' शुभे! भीरु! मेरे निकल जानेपर तुम्हें भी शोक नहीं करना चाहिये' ।। ३१-३२ ।।
इत्युक्ता सानवद्याङ्गी प्रत्युवाच मुनिं तदा ।
जरत्कारुं जरत्कारुश्चिन्ताशोकपरायणा ।। ३३ ।।
बाष्पगद्गदया वाचा मुखेन परिशुष्यता ।
कृताञ्जलिर्वरारोहा पर्यश्रुनयना ततः ।। ३४ ।।
धैर्यमालम्ब्य वामोरुर्हृदयेन प्रवेपता ।
न मामर्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम् ।। ३५ ।।
धर्मे स्थितां स्थितो धर्मे सदा प्रियहिते रताम् ।
प्रदाने कारणं यच्च मम तुभ्यं द्विजोत्तम ।। ३६ ।।
तदलब्धवती मन्दां किं मां वक्ष्यति वासुकिः ।
मातृशापाभिभूतानां ज्ञातीनां मम सत्तम ।। ३७ ।।
अपत्यमीप्सितं त्वत्तस्तच्च तावन्न दृश्यते ।
त्वत्तो ह्यपत्यलाभेन ज्ञातीनां मे शिवं भवेत् ।। ३८ ।।
उनके ऐसा कहनेपर अनिन्द्य सुन्दरी जरत्कारु भाईके कार्यकी चिन्ता और पतिके वियोगजनित शोकमें डूब गयी। उसका मुँह सूख गया, नेत्रोंमें आँसू छलक आये और हृदय काँपने लगा। फिर किसी प्रकार धैर्य धारण करके सुन्दर जाँघों और मनोहर शरीरवाली वह नागकन्या हाथ जोड़ गद्गद वाणीमें जरत्कारु मुनिसे बोली—'धर्मज्ञ! आप सदा धर्ममें स्थित रहनेवाले हैं। मैं भी पत्नी-धर्ममें स्थित तथा आप प्रियतमके हितमें लगी रहनेवाली हूँ। आपको मुझ निरपराध अबलाका त्याग नहीं करना चाहिये। द्विजश्रेष्ठ! मेरे भाईने जिस उद्देश्यको लेकर आपके साथ मेरा विवाह किया था, मैं मन्दभागिनी अबतक उसे पा न सकी। नागराज वासुकि मुझसे क्या कहेंगे? साधुशिरोमणे! मेरे कुटुम्बीजन माताके शापसे