भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 356

सौतिरुवाच

एतच्छ्रुत्वा स नागेन्द्रो वासुकिः परया मुदा । एवमस्त्विति तद् वाक्यं भगिन्याः प्रत्यगृह्णत ॥ १४ ॥ उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनक! यह सुनकर नागराज वासुकि बड़ी प्रसन्नतासे बोले—'एवमस्तु' (ऐसा ही हो)। इस प्रकार उन्होंने बहिनकी बातको विश्वासपूर्वक ग्रहण किया ॥ १४ ॥

सान्त्वमानार्थदानैश्च पूजया चानुरूपया । सोदर्या पूजयामास स्वसारं पन्नगोत्तमः ॥ १५ ॥ सर्पोंमें श्रेष्ठ वासुकि अपनी सहोदरा बहिनको सान्त्वना, सम्मान तथा धन देकर एवं सुन्दररूपसे उसका स्वागत-सत्कार करके उसकी समाराधना करने लगे ॥ १५ ॥

ततः प्रववृधे गर्भो महातेजा महाप्रभः । यथा सोमो द्विजश्रेष्ठ शुक्लपक्षोदितो दिवि ॥ १६ ॥ द्विजश्रेष्ठ! जैसे शुक्लपक्षमें आकाशमें उदित होनेवाला चन्द्रमा प्रतिदिन बढ़ता है, उसी प्रकार जरत्कारुका वह महातेजस्वी और परम कान्तिमान् गर्भ बढ़ने लगा ॥ १६ ॥

अथ काले तु सा ब्रह्मन् प्रजज्ञे भुजगस्वसा । कुमारं देवगर्भाभं पितृमातृभयापहम् ॥ १७ ॥ ब्रह्मन्! तदनन्तर समय आनेपर वासुकिकी बहिनने एक दिव्य कुमारको जन्म दिया, जो देवताओंके बालक-सा तेजस्वी जान पड़ता था। वह पिता और माता—दोनों पक्षोंके भयको नष्ट करनेवाला था ॥ १७ ॥

ववृधे स तु तत्रैव नागराजनिवेशने । वेदांश्चाधिजगे साङ्गान् भार्गवाच्च्यवनान्मुनेः ॥ १८ ॥ वह वहीं नागराजके भवनमें बढ़ने लगा। बड़े होनेपर उसने भृगुकुलोत्पन्न च्यवन मुनिसे छहों अंगोंसहित वेदोंका अध्ययन किया ॥ १८ ॥

चीर्णव्रतो बाल एव बुद्धिसत्त्वगुणान्वितः । नाम चास्याभवत् ख्यातं लोकेष्वास्तीक इत्युत ॥ १९ ॥ वह बचपनसे ही ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाला, बुद्धिमान् तथा सत्त्वगुणसम्पन्न हुआ। लोकमें आस्तीक नामसे उसकी ख्याति हुई ॥ १९ ॥

अस्तीत्युक्त्वा गतो यस्मात् पिता गर्भस्थमेव तम् । वनं तस्मादिदं तस्य नामास्तीकेति विश्रुतम् ॥ २० ॥ वह बालक अभी गर्भमें ही था, तभी उसके पिता 'अस्ति' कहकर वनमें चले गये थे। इसलिये संसारमें उसका आस्तीक नाम प्रसिद्ध हुआ ॥ २० ॥

स बाल एव तत्रस्थश्चरन्नमितबुद्धिमान् । गृहे पन्नगराजस्य प्रयत्नात् परिरक्षितः ॥ २१ ॥