महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 367, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंस दष्टमात्रो नागेन भस्मीभूतोऽभवन्नगः । काश्यपश्च ततो राजञ्जीवयत तं नगम् ॥ २३ ॥ नागके डँसते ही वह वृक्ष जलकर भस्म हो गया। राजन्! तदनन्तर काश्यपने (अपनी मन्त्र-विद्याके बलसे) उस वृक्षको पूर्ववत् जीवित (हरा-भरा) कर दिया ॥ २३ ॥
ततस्तं लोभयामास कामं ब्रूहीति तक्षकः । स एवमुक्तस्तं प्राह काश्यपस्तक्षकं पुनः ॥ २४ ॥ धनलिप्सुरहं तत्र यामीत्युक्तश्च तेन सः । तमुवाच महात्मानं तक्षकः श्लक्ष्णया गिरा ॥ २५ ॥ अब तक्षक काश्यपको प्रलोभन देने लगा। उसने कहा—'तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो।' तक्षकके ऐसा कहनेपर काश्यपने उससे कहा—'मैं तो वहाँ धनकी इच्छासे जा रहा हूँ।' उनके ऐसा कहनेपर तक्षकने महात्मा काश्यपसे मधुर वाणीमें कहा— ॥ २४-२५ ॥
यावद्धनं प्रार्थयसे राज्ञस्तस्मात् ततोऽधिकम् । गृहाण मत्त एव त्वं संनिवर्तस्व चानघ ॥ २६ ॥ 'अनघ! तुम राजासे जितना धन पाना चाहते हो, उससे भी अधिक मुझसे ही ले लो और लौट जाओ' ॥ २६ ॥
स एवमुक्तो नागेन काश्यपो द्विपदां वरः । लब्ध्वा वित्तं निववृते तक्षकाद् यावदीप्सितम् ॥ २७ ॥ तक्षक नागकी यह बात सुनकर मनुष्योंमें श्रेष्ठ काश्यप उससे इच्छानुसार धन लेकर लौट गये ॥ २७ ॥
तस्मिन् प्रतिगते विप्रे छद्मनोपेत्य तक्षकः । तं नृपं नृपतिश्रेष्ठं पितरं धार्मिकं तव ॥ २८ ॥ प्रासादस्थं यत्तमपि दग्धवान् विषवह्निना । ततस्त्वं पुरुषव्याघ्र विजयायाभिषेचितः ॥ २९ ॥ ब्राह्मणके चले जानेपर तक्षकने छलसे भूपालोंमें श्रेष्ठ तुम्हारे धर्मात्मा पिता राजा परीक्षित्के पास पहुँचकर, यद्यपि वे महलमें सावधानीके साथ रहते थे, तो भी उन्हें अपनी विषाग्निसे भस्म कर दिया। नरश्रेष्ठ! तदनन्तर विजयकी प्राप्तिके लिये तुम्हारा राजाके पदपर अभिषेक किया गया ॥ २८-२९ ॥
एतद् दृष्टं श्रुतं चापि यथावन्नृपसत्तम । अस्माभिर्निखिलं सर्वं कथितं तेऽतिदारुणम् ॥ ३० ॥ नृपश्रेष्ठ! यद्यपि यह प्रसंग बड़ा ही निष्ठुर और दुःखदायक है, तथापि तुम्हारे पूछनेसे हमने सब बातें तुमसे कही हैं। यह सब कुछ हमने अपनी आँखों देखा और कानोंसे भी ठीक-ठीक सुना है ॥ ३० ॥