भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 368

श्रुत्वा चैनं नरश्रेष्ठ पार्थिवस्य पराभवम् । अस्य चर्षेरुत्तंकस्य विधत्स्व यदनन्तरम् ॥ ३१ ॥ महाराज! इस प्रकार तक्षकने तुम्हारे पिता राजा परीक्षित्का तिरस्कार किया है। इन महर्षि उत्तंकको भी उसने बहुत तंग किया है। यह सब तुमने सुन लिया, अब तुम जैसा उचित समझो, करो ॥ ३१ ॥

सौतिरुवाच एतस्मिन्नेव काले तु स राजा जनमेजयः । उवाच मन्त्रिणः सर्वानिदं वाक्यमरिन्दमः ॥ ३२ ॥ उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनक! उस समय शत्रुओंका दमन करनेवाले राजा जनमेजय अपने सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले ॥ ३२ ॥

जनमेजय उवाच अथ तत् कथितं केन यद् वृत्तं तद् वनस्पतौ । आश्चर्यभूतं लोकस्य भस्मराशीकृतं तदा ॥ ३३ ॥ यद् वृक्षं जीवयामास काश्यपस्तक्षकेण वै । नूनं मन्त्रैर्हतविषो न प्रणश्येत काश्यपात् ॥ ३४ ॥ जनमेजयने कहा—उस वृक्षके डँसे जाने और फिर हरे होनेकी बात आपलोगोंसे किसने कही? उस समय तक्षकके काटनेसे जो वृक्ष राखका ढेर बन गया था, उसे काश्यपने पुनः जिलाकर हरा-भरा कर दिया। यह सब लोगोंके लिये बड़े आश्चर्यकी बात है। यदि काश्यपके आ जानेसे उनके मन्त्रोंद्वारा तक्षकका विष नष्ट कर दिया जाता तो निश्चय ही मेरे पिताजी बच जाते ॥ ३३-३४ ॥

चिन्तयामास पापात्मा मनसा पन्नगाधमः । दष्टं यदि मया विप्रः पार्थिवं जीवयिष्यति ॥ ३५ ॥ तक्षकः संहतविषो लोके यास्यति हास्यताम् । विचिन्त्यैवं कृता तेन ध्रुवं तुष्टिर्द्विजस्य वै ॥ ३६ ॥ परंतु उस पापात्मा नीच सर्पने अपने मनमें यह सोचा होगा—'यदि मेरे डँसे हुए राजाको ब्राह्मण जिला देंगे तो लोग कहेंगे कि तक्षकका विष भी नष्ट हो गया। इस प्रकार तक्षक लोकमें उपहासका पात्र बन जायगा।' अवश्य ही ऐसा सोचकर उसने ब्राह्मणको धनके द्वारा संतुष्ट किया था ॥ ३५-३६ ॥

भविष्यति ह्युपायेन यस्य दास्यामि यातनाम् । एकं तु श्रोतुमिच्छामि तद् वृत्तं निर्जने वने ॥ ३७ ॥ संवादं पन्नगेन्द्रस्य काश्यपस्य च कस्तदा । श्रुतवान् दृष्टवांश्चापि भवत्सु कथमागतम् ।