महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रुत्वा तस्य विधास्येऽहं पन्नगान्तकरीं मतिम् ॥ ३८ ॥ अच्छा, भविष्यमें प्रयत्नपूर्वक कोई-न-कोई उपाय करके तक्षकको इसके लिये दण्ड दूँगा। परंतु एक बात मैं सुनना चाहता हूँ। नागराज तक्षक और काश्यप ब्राह्मणका वह संवाद तो निर्जन वनमें हुआ होगा। यह सब वृत्तान्त किसने देखा और सुना था? आपलोगोंतक यह बात कैसे आयी? यह सब सुनकर मैं सर्पोंके नाशका विचार करूँगा ॥ ३७-३८ ॥
मन्त्रिण ऊचुः शृणु राजन् यथास्माकं येन तत् कथितं पुरा । समागतं द्विजेन्द्रस्य पन्नगेन्द्रस्य चाध्वनि ॥ ३९ ॥ तस्मिन् वृक्षे नरः कश्चिदिन्धनार्थाय पार्थिव । विचिन्वन् पूर्वमारूढः शुष्कशाखां वनस्पतौ ॥ ४० ॥ मन्त्री बोले—राजन्! सुनो, विप्रवर काश्यप और नागराज तक्षकका मार्गमें एक-दूसरेके साथ जो समागम हुआ था, उसका समाचार जिसने और जिस प्रकार हमारे सामने बताया था, उसका वर्णन करते हैं। भूपाल! उस वृक्षपर पहलेसे ही कोई मनुष्य लकड़ी लेनेके लिये सूखी डाली खोजता हुआ चढ़ गया था ॥ ३९-४० ॥ न बुध्येतामुभौ तौ च नगस्थं पन्नगद्विजौ । सह तेनैव वृक्षेण भस्मीभूतोऽभवन्नृप ॥ ४१ ॥ तक्षक नाग और ब्राह्मण—दोनों ही नहीं जानते थे कि इस वृक्षपर कोई दूसरा मनुष्य भी है। राजन्! तक्षकके काटनेपर उस वृक्षके साथ ही वह मनुष्य भी जलकर भस्म हो गया था ॥ ४१ ॥ द्विजप्रभावाद् राजेन्द्र व्यजीवत् सवनस्पतिः । तेनागम्य नरश्रेष्ठ पुंसास्मासु निवेदितम् ॥ ४२ ॥ परंतु राजेन्द्र! ब्राह्मणके प्रभावसे वह भी उस वृक्षके साथ जी उठा। नरश्रेष्ठ! उसी मनुष्यने आकर हमलोगोंसे तक्षक और ब्राह्मणकी जो घटना थी, वह सुनायी ॥ ४२ ॥ यथावृत्तं तु तत् सर्वं तक्षकस्य द्विजस्य च । एतत् ते कथितं राजन् यथा दृष्टं श्रुतं च यत् । श्रुत्वा च नृपशार्दूल विधत्स्व यदनन्तरम् ॥ ४३ ॥ राजन्! इस प्रकार हमने जो कुछ सुना और देखा है, वह सब तुम्हें कह सुनाया। भूपालशिरोमणे! यह सुनकर अब तुम्हें जैसा उचित जान पड़े, वह करो ॥ ४३ ॥
सौतिरुवाच मन्त्रिणां तु वचः श्रुत्वा स राजा जनमेजयः । पर्यतप्यत दुःखार्तः प्रत्यपिंषत् करं करे ॥ ४४ ॥