भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 373

**ऋत्विजोंने कहा—**राजन्! इसके लिये एक महान् यज्ञ है, जिसका देवताओंने आपके लिये पहलेसे ही निर्माण कर रखा है। उसका नाम है सर्पसत्र। पुराणोंमें उसका वर्णन आया है॥ ६॥
आहर्ता तस्य सत्रस्य त्वन्नान्योऽस्ति नराधिप।
इति पौराणिकाः प्राहुरस्माकं चास्ति स क्रतुः॥ ७॥
नरेश्वर! उस यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है, ऐसा पौराणिक विद्वान् कहते हैं। उस यज्ञका विधान हमलोगोंको मालूम है॥ ७॥
एवमुक्तः स राजर्षिर्मेने दग्धं हि तक्षकम्।
हुताशनमुखे दीप्ते प्रविष्टमिति सत्तम॥ ८॥
साधुशिरोमणे! ऋत्विजोंके ऐसा कहनेपर राजर्षि जनमेजयको विश्वास हो गया कि अब तक्षक निश्चय ही प्रज्वलित अग्निके मुखमें समाकर भस्म हो जायगा॥ ८॥
ततोऽब्रवीन्मन्त्रविदस्तान् राजा ब्राह्मणांस्तदा।
आहरिष्यामि तत् सत्रं सम्भाराः सम्भ्रियन्तु मे॥ ९॥
तब राजाने उस समय उन मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणोंसे कहा—‘मैं उस यज्ञका अनुष्ठान करूँगा। आपलोग उसके लिये आवश्यक सामग्री संग्रह कीजिये’॥ ९॥
ततस्ते ऋत्विजस्तस्य शास्त्रतो द्विजसत्तम।
तं देशं मापयामासुर्यज्ञायतनकारणात्॥ १०॥
द्विजश्रेष्ठ! तब उन ऋत्विजोंने शास्त्रीय विधिके अनुसार यज्ञमण्डप बनानेके लिये वहाँकी भूमि नाप ली॥ १०॥
यथावद् वेदविद्वांसः सर्वे बुद्धेः परं गताः।
ऋद्ध्या परमया युक्तमिष्टं द्विजगणैर्युतम्॥ ११॥
प्रभूतधनधान्याढ्यमृत्विग्भिः सुनिषेवितम्।
निर्माय चापि विधिवद् यज्ञायतनमीप्सितम्॥ १२॥
राजानं दीक्षयामासुः सर्पसत्राप्तये तदा।
इदं चासीत् तत्र पूर्वं सर्पसत्रे भविष्यति॥ १३॥
वे सभी ऋत्विज् वेदोंके यथावत् विद्वान् तथा परम बुद्धिमान् थे। उन्होंने विधिपूर्वक मनके अनुरूप एक यज्ञ-मण्डप बनाया, जो परम समृद्धिसे सम्पन्न, उत्तम द्विजोंके समुदायसे सुशोभित, प्रचुर धनधान्यसे परिपूर्ण तथा ऋत्विजोंसे सुसेवित था। उस यज्ञमण्डपका निर्माण कराकर ऋत्विजोंने सर्पयज्ञकी सिद्धिके लिये उस समय राजा जनमेजयको दीक्षा दी। इसी समय जब कि सर्पसत्र अभी प्रारम्भ होनेवाला था, वहाँ पहले ही यह घटना घटित हुई॥ ११—१३॥
निमित्तं महदुत्पन्नं यज्ञविघ्नकरं तदा।
यज्ञस्यायतने तस्मिन् क्रियमाणे वचोऽब्रवीत्॥ १४॥