भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 374

स्थपतिर्बुद्धिसम्पन्नो वास्तुविद्याविशारदः । इत्यब्रवीत् सूत्रधारः सूतः पौराणिकस्तदा ॥ १५ ॥ उस यज्ञमें विघ्न डालनेवाला बहुत बड़ा कारण प्रकट हो गया। जब वह यज्ञमण्डप बनाया जा रहा था, उस समय वास्तुशास्त्रके पारंगत विद्वान्, बुद्धिमान् एवं अनुभवी सूत्रधार शिल्पवेत्ता सूतने वहाँ आकर कहा— ॥ १४-१५ ॥ यस्मिन् देशे च काले च मापनेयं प्रवर्तिता । ब्राह्मणं कारणं कृत्वा नायं संस्थास्यते क्रतुः ॥ १६ ॥ ‘जिस स्थान और समयमें यह यज्ञमण्डप मापनेकी क्रिया प्रारम्भ हुई है, उसे देखकर यह मालूम होता है कि एक ब्राह्मणको निमित्त बनाकर यह यज्ञ पूर्ण न हो सकेगा’ ॥ १६ ॥ एतच्छ्रुत्वा तु राजासौ प्राग्दीक्षाकालमब्रवीत् । क्षत्तारं न हि मे कश्चिदज्ञातः प्रविशेदिति ॥ १७ ॥ यह सुनकर राजा जनमेजयने दीक्षा लेनेसे पहले ही सेवकको यह आदेश दे दिया—‘मुझे सूचित किये बिना किसी अपरिचित व्यक्तिको यज्ञमण्डपमें प्रवेश न करने दिया जाय’ ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रोपक्रमे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रोपक्रमसम्बन्धी इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥