भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सर्पसत्रका आरम्भ और उसमें सर्पोंका विनाश

सौतिरुवाच

ततः कर्म प्रवृत्ते सर्पसत्रविधानतः ।
पर्यक्रामंश्च विधिवत् स्वे स्वे कर्मणि याजकाः ॥ १ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनक! तदनन्तर सर्पयज्ञकी विधिसे कार्य प्रारम्भ हुआ। सब याजक विधिपूर्वक अपने-अपने कर्ममें संलग्न हो गये ॥ १ ॥

प्रावृत्य कृष्णवासांसि धूमसंरक्तलोचनाः ।
जुहुवुर्मन्त्रवच्चैव समिद्धं जातवेदसम् ॥ २ ॥
सबकी आँखें धूएँसे लाल हो रही थीं। वे सभी ऋत्विज् काले वस्त्र पहनकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक प्रज्वलित अग्निमें होम करने लगे ॥ २ ॥

कम्पयन्तश्च सर्वेषामुरगाणां मनांसि च ।
सर्पानाजुहुवुस्तत्र सर्वानग्निमुखे तदा ॥ ३ ॥
वे समस्त सर्पोंके हृदयमें कँपकँपी पैदा करते हुए उनके नाम ले-लेकर उन सबका वहाँ आगके मुखमें होम करने लगे ॥ ३ ॥

ततः सर्पाः समापेतुः प्रदीप्ते हव्यवाहने ।
विचेष्टमानाः कृपणमाह्वयन्तः परस्परम् ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् सर्पगण तड़फड़ाते और दीनस्वरमें एक-दूसरेको पुकारते हुए प्रज्वलित अग्निमें टपाटप गिरने लगे ॥ ४ ॥

विस्फुरन्तः श्वसन्तश्च वेष्टयन्तः परस्परम् ।
पुच्छैः शिरोभिश्च भृशं चित्रभानुं प्रपेदिरे ॥ ५ ॥
वे उछलते, लम्बी साँसें लेते, पूँछ और फनोंसे एक-दूसरेको लपेटते हुए धधकती आगके भीतर अधिकाधिक संख्यामें गिरने लगे ॥ ५ ॥

श्वेताः कृष्णाश्च नीलाश्च स्थविराः शिशवस्तथा ।
नदन्तो विविधान् नादान् पेतुर्दीप्ते विभावसौ ॥ ६ ॥
सफेद, काले, नीले, बूढ़े और बच्चे सभी प्रकारके सर्प विविध प्रकारसे चीत्कार करते हुए जलती आगमें विवश होकर गिर रहे थे ॥ ६ ॥

क्रोशयोजनमात्रा हि गोकर्णस्य प्रमाणतः ।
पतन्त्यजस्रं वेगेन वह्नावग्निमतां वर ॥ ७ ॥
कोई एक कोस लम्बे थे, तो कोई चार कोस और किन्हीं-किन्हींकी लम्बाई तो केवल गायके कानके बराबर थी। अग्निहोत्रियोंमें श्रेष्ठ शौनक! वे छोटे-बड़े सभी सर्प बड़े वेगसे