महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 394, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वैर्देवैः परिसंस्तूयमानः । बलाहकैश्चाप्यनुगम्यमानो विद्याधरैरप्सरसां गणैश्च ॥ ९ ॥ यह सुनकर यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करनेवाले यजमान राजा जनमेजय संतप्त हो उठे और कर्मके समय होता-को इन्द्रसहित तक्षक नागका आकर्षण करनेके लिये प्रेरित करने लगे। तब होताने एकाग्रचित्त होकर मन्त्रोंद्वारा इन्द्रसहित तक्षकका आवाहन किया। तब स्वयं देवराज इन्द्र विमानपर बैठकर आकाशमार्गसे चल पड़े। उस समय सम्पूर्ण देवता सब ओरसे घेरकर उन महानुभाव इन्द्रकी स्तुति कर रहे थे। अप्सराएँ, मेघ और विद्याधर भी उनके पीछे-पीछे आ रहे थे ॥ ८-९ ॥ तस्योत्तरीये निहितः स नागो भयोद्विग्नः शर्म नैवाभ्यगच्छत् । ततो राजा मन्त्रविदोऽब्रवीत् पुनः क्रुद्धो वाक्यं तक्षकस्यान्तमिच्छन् ॥ १० ॥ तक्षक नाग उन्हींके उत्तरीय वस्त्र (दुपट्टे)-में छिपा था। भयसे उद्विग्न होनेके कारण तक्षकको तनिक भी चैन नहीं आता था। इधर राजा जनमेजय तक्षकका नाश चाहते हुए कुपित होकर पुनः मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणोंसे बोले ॥ १० ॥
जनमेजय उवाच
इन्द्रस्य भवने विप्रा यदि नागः स तक्षकः । तमिन्द्रेणैव सहितं पातयध्वं विभावसौ ॥ ११ ॥ **जनमेजयने कहा—**विप्रगण! यदि तक्षक नाग इन्द्रके विमानमें छिपा हुआ है तो उसे इन्द्रके साथ ही अग्निमें गिरा दो ॥ ११ ॥
सौतिरुवाच
जनमेजयेन राज्ञा तु नोदितस्तक्षकं प्रति । होता जुहाव तत्रस्थं तक्षकं पन्नगं तथा ॥ १२ ॥ **उग्रश्रवाजी कहते हैं—**राजा जनमेजयके द्वारा इस प्रकार तक्षककी आहुतिके लिये प्रेरित हो होताने इन्द्रके समीपवर्ती तक्षक नागका अग्निमें आवाहन किया—उसके नामकी आहुति डाली ॥ १२ ॥ हूयमाने तथा चैव तक्षकः सपुरन्दरः । आकाशे ददृशे चैव क्षणेन व्यथितस्तदा ॥ १३ ॥ इस प्रकार आहुति दी जानेपर क्षणभरमें इन्द्रसहित तक्षक नाग आकाशमें दिखायी दिया। उस समय उसे बड़ी पीड़ा हो रही थी ॥ १३ ॥ पुरन्दरस्तु तं यज्ञं दृष्ट्वोरुभयमाविशत् ।