भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 395

हित्वा तु तक्षकं त्रस्तः स्वमेव भवनं ययौ ॥ १४ ॥ उस यज्ञको देखते ही इन्द्र अत्यन्त भयभीत हो उठे और तक्षक नागको वहीं छोड़कर बड़ी घबराहटके साथ अपने भवनको ही चलते बने ॥ १४ ॥ इन्द्रे गते तु नागेन्द्रस्तक्षको भयमोहितः । मन्त्रशक्त्या पावकार्चिः समीपमवशो गतः ॥ १५ ॥ इन्द्रके चले जानेपर नागराज तक्षक भयसे मोहित हो मन्त्रशक्तिसे खिंचकर विवशतापूर्वक अग्निकी ज्वालाके समीप आने लगा ॥ १५ ॥

ऋत्विज ऊचुः वर्तते तव राजेन्द्र कर्मैतद् विधिवत् प्रभो । अस्मै तु द्विजमुख्याय वरं त्वं दातुमर्हसि ॥ १६ ॥ ऋत्विजोंने कहा—राजेन्द्र! आपका यह यज्ञकर्म विधिपूर्वक सम्पन्न हो रहा है। अब आप इन विप्रवर आस्तीकको मनोवांछित वर दे सकते हैं ॥ १६ ॥

जनमेजय उवाच बालाभिरूपस्य तवाप्रमेय वरं प्रयच्छामि यथानुरूपम् । वृणीष्व यत् तेऽभिमतं हृदि स्थितं तत् ते प्रदास्याम्यपि चेददेयम् ॥ १७ ॥ जनमेजयने कहा—ब्राह्मणबालक! तुम अप्रमेय हो—तुम्हारी प्रतिभाकी कोई सीमा नहीं है। मैं तुम-जैसे विद्वान्‌के लिये वर देना चाहता हूँ। तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट कामना हो, उसे बताओ। वह देनेयोग्य न होगी, तो भी तुम्हें अवश्य दे दूँगा ॥ १७ ॥

ऋत्विज ऊचुः अयमायाति तूर्णं स तक्षकस्ते वशं नृप । श्रूयतेऽस्य महान् नादो नदतो भैरवं रवम् ॥ १८ ॥ ऋत्विज बोले—राजन्! यह तक्षक नाग अब शीघ्र ही तुम्हारे वशमें आ रहा है। वह बड़ी भयानक आवाजमें चीत्कार कर रहा है। उसकी भारी चिल्लाहट अब सुनायी देने लगी है ॥ १८ ॥ नूनं मुक्तो वज्रभृता स नागो भ्रष्टो नाकान्मन्त्रविस्रस्तकायः । घूर्णन्नाकाशे नष्टसंज्ञोऽभ्युपैति तीव्रान् निःश्वासान् निःश्वसन् पन्नगेन्द्रः ॥ १९ ॥

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