महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआस्तीकेनैवमुक्तस्तु राजा पारिक्षितस्तदा । पुनः पुनरुवाचेदमास्तीकं वदतां वरः ।। २५ ।। अन्यं वरय भद्रं ते वरं द्विजवरोत्तम । अयाचत न चाप्यन्यं वरं स भृगुनन्दन ।। २६ ।। **उग्रश्रवाजी कहते हैं—**भृगुनन्दन शौनक! आस्तीकके ऐसा कहनेपर उस समय वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा जनमेजयने उनसे बार-बार अनुरोध किया—‘विप्रशिरोमणे! आपका कल्याण हो, कोई दूसरा वर माँगिये।' किंतु आस्तीकने दूसरा कोई वर नहीं माँगा ।। २५-२६ ।। ततो वेदविदस्तात सदस्याः सर्व एव तम् । राजानमूचुः सहिता लभतां ब्राह्मणो वरम् ।। २७ ।। तब सम्पूर्ण वेदवेत्ता सभासदोंने एक साथ संगठित होकर राजासे कहा—‘ब्राह्मणको (स्वीकार किया हुआ) वर मिलना ही चाहिये' ।। २७ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि आस्तीकवरप्रदानं नाम षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें आस्तीकको वरप्रदान नामक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५६ ।।