महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
सर्पयज्ञमें दग्ध हुए प्रधान-प्रधान सर्पोंके नाम
शौनक उवाच
ये सर्पाः सर्पसत्रेऽस्मिन् पतिता हव्यवाहने ।
तेषां नामानि सर्वेषां श्रोतुमिच्छामि सूतज ॥ १ ॥
**शौनकजीने पूछा—**सूतनन्दन! इस सर्पसत्रकी धधकती हुई आगमें जो-जो सर्प गिरे थे, उन सबके नाम मैं सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
सौतिरुवाच
सहस्राणि बहून्यस्मिन् प्रयुतान्यर्बुदानि च ।
न शक्यं परिसंख्यातुं बहुत्वान् द्विजसत्तम ॥ २ ॥
**उग्रश्रवाजीने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! इस यज्ञमें सहस्रों, लाखों एवं अरबों सर्प गिरे थे, उनकी संख्या बहुत होनेके कारण गणना नहीं की जा सकती ॥ २ ॥
यथास्मृति तु नामानि पन्नगानां निबोध मे ।
उच्यमानानि मुख्यानां हुतानां जातवेदसि ॥ ३ ॥
परंतु सर्पयज्ञकी अग्निमें जिन प्रधान-प्रधान नागोंकी आहुति दी गयी थी, उन सबके नाम अपनी स्मृतिके अनुसार बता रहा हूँ, सुनो ॥ ३ ॥
वासुकेः कुलजातांस्तु प्राधान्येन निबोध मे ।
नीलरक्तान् सितान् घोरान् महाकायान् विषोल्बणान् ॥ ४ ॥
पहले वासुकिके कुलमें उत्पन्न हुए मुख्य-मुख्य सर्पोंके नाम सुनो—वे सब-के-सब नीले, लाल, सफेद और भयानक थे। उनके शरीर विशाल और विष अत्यन्त भयंकर थे ॥ ४ ॥
अवशान् मातृवाग्दण्डपीडितान् कृपणान् हुतान् ।
कोटिशो मानसः पूर्णः शलः पालो हलीमकः ॥ ५ ॥
पिच्छलः कौणपश्चक्रः कालवेगः प्रकालनः ।
हिरण्यबाहुः शरणः कक्षकः कालदन्तकः ॥ ६ ॥
वे बेचारे सर्प माताके शापसे पीड़ित हो विवशतापूर्वक सर्पयज्ञकी आगमें होम दिये गये थे। उनके नाम इस प्रकार हैं—कोटिश, मानस, पूर्ण, शल, पाल, हलीमक, पिच्छल, कौणप, चक्र, कालवेग, प्रकालन, हिरण्यबाहु, शरण, कक्षक और कालदन्तक ॥ ५-६ ॥
एते वासुकिजा नागाः प्रविष्टा हव्यवाहने ।
अन्ये च बहवो विप्र तथा वै कुलसम्भवाः ।