भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 424

द्रुपदकुमारी कृष्णा भी सब कुछ करनेमें समर्थ, सती-साध्वी देवी थीं। धृतराष्ट्रके दुरात्मा पुत्रोंद्वारा सतायी जानेपर भी उन्होंने अपनी क्रोधपूर्ण दृष्टिसे उन सबको जलाकर भस्म क्यों नहीं कर दिया? ।। ७ ।। कथं व्यसनिनं द्यूते पार्थौ माद्रीसुतौ तथा । अन्वयुस्ते नरव्याघ्रा बाध्यमाना दुरात्मभिः ॥ ८ ॥ कुन्तीके दोनों पुत्र भीमसेन और अर्जुन तथा माद्री-नन्दन नकुल और सहदेव भी उस समय दुष्ट कौरवोंद्वारा अकारण सताये गये थे। उन चारों भाइयोंने जुएके दुर्व्यसनमें फँसे हुए राजा युधिष्ठिरका साथ क्यों दिया? ।। ८ ।। कथं धर्मभृतां श्रेष्ठः सुतो धर्मस्य धर्मवित् । अनर्हः परमं क्लेशं सोढवान् स युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मपुत्र युधिष्ठिर धर्मके ज्ञाता थे, महान् क्लेशमें पड़नेयोग्य कदापि नहीं थे, तो भी उन्होंने वह सब कैसे सहन कर लिया? ।। ९ ।। कथं च बहुलाः सेनाः पाण्डवः कृष्णसारथिः । अस्यन्नेकोऽनयत् सर्वाः पितृलोकं धनंजयः ॥ १० ॥ भगवान् श्रीकृष्ण जिनके सारथि थे, उन पाण्डुनन्दन अर्जुनने अकेले ही बाणोंकी वर्षा करके समस्त सेनाओंको, जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी, किस प्रकार यमलोक पहुँचा दिया? ।। १० ।। एतदाचक्ष्व मे सर्वं यथावृत्तं तपोधन । यद् यच्च कृतवन्तस्ते तत्र तत्र महारथाः ॥ ११ ॥ तपोधन! यह सब वृत्तान्त आप ठीक-ठीक मुझे बताइये। उन महारथी वीरोंने विभिन्न स्थानों और अवसरोंमें जो-जो कर्म किये थे, वह सब सुनाइये ।। ११ ।।

वैशम्पायन उवाच

क्षणं कुरु महाराज विपुलॊऽयमनुक्रमः । पुण्याख्यानस्य वक्तव्यः कृष्णद्वैपायनेरितः ॥ १२ ॥ वैशम्पायनजी बोले— महाराज! इसके लिये कुछ समय नियत कीजिये; क्योंकि इस पवित्र आख्यानका श्रीव्यासजीके द्वारा जो क्रमानुसार वर्णन किया गया है, वह बहुत विस्तृत है और वह सब आपके समक्ष कहकर सुनाना है ।। १२ ।। महर्षेः सर्वलोकेषु पूजितस्य महात्मनः । प्रवक्ष्यामि मतं कृत्स्नं व्यासस्यामिततेजसः ॥ १३ ॥ सर्वलोकपूजित अमित तेजस्वी महामना महर्षि व्यासजीके सम्पूर्ण मतका यहाँ वर्णन करूँगा ।। १३ ।। इदं शतसहस्रं हि श्लोकानां पुण्यकर्मणाम् ।