भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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उच्यतां स्वागतमिति वाचोऽश्रूयन्त सर्वशः ॥ १२० ॥ फिर सब लोग कहने लगे, 'हम तो सर्वथा इनका स्वागत करते हैं। हमारे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज हम महाराज पाण्डुकी संतानको अपनी आँखोंसे देख रहे हैं।' फिर तो सब ओरसे स्वागत बोलनेवालोंकी ही बातें सुनायी देने लगीं ॥ १२० ॥

तस्मिन्नुपरते शब्दे दिशः सर्वा निनादयन् । अन्तर्हितानां भूतानां निःस्वनस्तुमुलोऽभवत् ॥ १२१ ॥ दर्शकोंका वह तुमुल शब्द बन्द होनेपर सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करती हुई अदृश्य भूतों—देवताओंकी यह सम्मिलित आवाज (आकाशवाणी) गूँज उठी—'ये पाण्डव ही हैं' ॥ १२१ ॥

पुष्पवृष्टिः शुभा गन्धाः शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनाः । आसन् प्रवेशे पार्थानां तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १२२ ॥ जिस समय पाण्डवोंने नगरमें प्रवेश किया, उसी समय फूलोंकी वर्षा होने लगी, सब ओर सुगन्ध छा गयी तथा शंख और दुन्दुभियोंके मांगलिक शब्द सुनायी देने लगे। यह एक अद्भुत चमत्कारकी-सी बात हुई ॥ १२२ ॥

तत्प्रीत्या चैव सर्वेषां पौराणां हर्षसम्भवः । शब्द आसीन्महांस्तत्र दिवःस्पृक्कीर्तिवर्धनः ॥ १२३ ॥ सभी नागरिक पाण्डवोंके प्रेमसे आनन्दमें भरकर ऊँचे स्वरसे अभिनन्दन-ध्वनि करने लगे। उनका वह महान् शब्द स्वर्गलोकतक गूँज उठा जो पाण्डवोंकी कीर्ति बढ़ानेवाला था ॥ १२३ ॥

तेऽधीत्य निखिलान् वेदाञ्छास्त्राणि विविधानि च । न्यवसन् पाण्डवास्तत्र पूजिता अकुतोभयाः ॥ १२४ ॥ वे सम्पूर्ण वेद एवं विविध शास्त्रोंका अध्ययन करके वहीं निवास करने लगे। सभी उनका आदर करते थे और उन्हें किसीसे भय नहीं था ॥ १२४ ॥

युधिष्ठिरस्य शौचेन प्रीताः प्रकृतयोऽभवन् । धृत्या च भीमसेनस्य विक्रमेणार्जुनस्य च ॥ १२५ ॥ गुरुशुश्रूषया क्षान्त्या यमयोर्विनयेन च । तुतोष लोकः सकलस्तेषां शौर्यगुणेन च ॥ १२६ ॥ राष्ट्रकी सम्पूर्ण प्रजा युधिष्ठिरके शौचाचार, भीमसेनकी धृति, अर्जुनके विक्रम तथा नकुल-सहदेवकी गुरुशुश्रूषा, क्षमाशीलता और विनयसे बहुत ही प्रसन्न होती थी। सब लोग पाण्डवोंके शौर्यगुणसे संतोषका अनुभव करते थे* ॥

समवाये ततो राज्ञां कन्यां भर्तृस्वयंवराम् । प्राप्तवानर्जुनः कृष्णां कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ १२७ ॥