महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर कुछ कालके पश्चात् राजाओंके समुदायमें अर्जुनने अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके स्वयं ही पति चुननेवाली द्रुपदकन्या कृष्णाको प्राप्त किया ॥ १२७ ॥ ततः प्रभृति लोकेऽस्मिन् पूज्यः सर्वधनुष्मताम् । आदित्य इव दुष्प्रेक्ष्यः समरेष्वपि चाभवत् ॥ १२८ ॥ तभीसे वे इस लोकमें सम्पूर्ण धनुर्धारियोंके पूजनीय (आदरणीय) हो गये और समरांगणमें प्रचण्ड मार्तण्डकी भाँति प्रतापी अर्जुनकी ओर किसीके लिये आँख उठाकर देखना भी कठिन हो गया ॥ १२८ ॥ स सर्वान् पार्थिवाञ् जित्वा सर्वांश्च महतो गणान् । आजहारार्जुनो राज्ञो राजसूयं महाक्रतुम् ॥ १२९ ॥ उन्होंने पृथक्-पृथक् तथा महान् संघ बनाकर आये हुए सब राजाओंको जीतकर महाराज युधिष्ठिरके राजसूय नामक महायज्ञको सम्पन्न कराया ॥ १२९ ॥ अन्नवान् दक्षिणावांश्च सर्वैः समुदितो गुणैः । युधिष्ठिरेण सम्प्राप्तो राजसूयो महाक्रतुः ॥ १३० ॥ सुनयाद् वासुदेवस्य भीमार्जुनबलेन च । घातयित्वा जरासन्धं चैद्यं च बलगर्वितम् ॥ १३१ ॥ भगवान् श्रीकृष्णकी सुन्दर नीति और भीमसेन तथा अर्जुनकी शक्तिसे बलके घमण्डमें चूर रहनेवाले जरासन्ध और चेदिराज शिशुपालको मरवाकर धर्मराज युधिष्ठिरने महायज्ञ राजसूयका सम्पादन किया। वह यज्ञ सभी उत्तम* गुणोंसे सम्पन्न था। उसमें प्रचुर अन्न और पर्याप्त दक्षिणाका वितरण किया गया था ॥ १३०-१३१ ॥ दुर्योधनं समागच्छन्नर्हणानि ततस्ततः । मणिकाञ्चनरत्नानि गोहस्त्यश्वधनानि च ॥ १३२ ॥ विचित्राणि च वासांसि प्रावारावरणानि च । कम्बलाजिनरत्नानि राङ्कवास्तरणानि च ॥ १३३ ॥ उस समय इधर-उधर विभिन्न देशों तथा नृपतियोंके यहाँसे मणि, सुवर्ण, रत्न, गाय, हाथी, घोड़े, धन-सम्पत्ति, विचित्र वस्त्र, तम्बू, कनात, परदे, उत्तम कम्बल, श्रेष्ठ मृगचर्म तथा रंकुनामक मृगके बालोंसे बने हुए कोमल बिछौने आदि जो उपहारकी बहुमूल्य वस्तुएँ आतीं, वे दुर्योधनके हाथमें दी जातीं—उसीकी देख-रेखमें रखी जाती थीं ॥ १३२-१३३ ॥ समृद्धां तां तथा दृष्ट्वा पाण्डवानां तदा श्रियम् । ईर्ष्यासमुत्थः सुमहांस्तस्य मन्युरजायत ॥ १३४ ॥ उस समय पाण्डवोंकी वह बढ़ी-चढ़ी समृद्धि-सम्पत्ति देखकर दुर्योधनके मनमें ईर्ष्याजनित महान् रोष एवं दुःखका उदय हुआ ॥ १३४ ॥ विमानप्रतिमां तत्र मयेन सुकृतां सभाम् । पाण्डवानामुपहृतां स दृष्ट्वा पर्यतप्यत ॥ १३५ ॥