महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 47, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस अवसरपर मयदानवने पाण्डवोंको एक सभाभवन भेंटमें दिया था, जिसकी रूपरेखा विमानके समान थी। वह भवन उसके शिल्पकौशलका एक अच्छा नमूना था। उसे देखकर दुर्योधनको और अधिक संताप हुआ ॥ १३५ ॥ तत्रावहसितश्चासीत् प्रस्कन्दन्निव सम्भ्रमात् । प्रत्यक्षं वासुदेवस्य भीमेनानभिजातवत् ॥ १३६ ॥ उसी सभाभवनमें जब सम्भ्रम (जलमें स्थल और स्थलमें जलका भ्रम) होनेके कारण दुर्योधनके पाँव फिसलने-से लगे, तब भगवान् श्रीकृष्णके सामने ही भीमसेनने उसे गँवार-सा सिद्ध करते हुए उसकी हँसी उड़ायी थी ॥ १३६ ॥ स भोगान् विविधान् भुञ्जन् रत्नानि विविधानि च । कथितो धृतराष्ट्रस्य विवर्णो हरिणः कृशः ॥ १३७ ॥ दुर्योधन नाना प्रकारके भोग तथा भाँति-भाँतिके रत्नोंका उपयोग करते रहनेपर भी दिनोदिन दुबला रहने लगा। उसका रंग फीका पड़ गया। इसकी सूचना कर्मचारियोंने महाराज धृतराष्ट्रको दी ॥ १३७ ॥ अन्वजानात् ततो द्यूतं धृतराष्ट्रः सुतप्रियः । तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य कोपः समभवन्महान् ॥ १३८ ॥ धृतराष्ट्र अपने उस पुत्रके प्रति अधिक आसक्त थे, अतः उसकी इच्छा जानकर उन्होंने उसे पाण्डवोंके साथ जूआ खेलनेकी आज्ञा दे दी। जब भगवान् श्रीकृष्णने यह समाचार सुना, तब उन्हें धृतराष्ट्रपर बड़ा क्रोध आया ॥ १३८ ॥ नातिप्रीतमनाश्चासीद् विवादांश्चान्वमोदत । द्यूतादीननयान् घोरान् विविधांश्चाप्युपैक्षत ॥ १३९ ॥ यद्यपि उनके मनमें कलहकी सम्भावनाके कारण कुछ विशेष प्रसन्नता नहीं हुई, तथापि उन्होंने (मौन रहकर) इन विवादोंका अनुमोदन ही किया और भिन्न-भिन्न प्रकारके भयंकर अन्याय, द्यूत आदिको देखकर भी उनकी उपेक्षा कर दी ॥ १३९ ॥ निरस्य विदुरं भीष्मं द्रोणं शारद्वतं कृपम् । विग्रहे तुमुले तस्मिन् दहन् क्षत्रं परस्परम् ॥ १४० ॥ (इस अनुमोदन या उपेक्षाका कारण यह था कि वे धर्मनाशक दुष्ट राजाओंका संहार चाहते थे। अतः उन्हें विश्वास था कि) इस विग्रहजनित महान् युद्धमें विदुर, भीष्म, द्रोणाचार्य तथा कृपाचार्यकी अवहेलना करके सभी दुष्ट क्षत्रिय एक-दूसरेको अपनी क्रोधाग्निमें भस्म कर डालेंगे ॥ १४० ॥ जयत्सु पाण्डुपुत्रेषु श्रुत्वा सुमहदप्रियम् । दुर्योधनमतं ज्ञात्वा कर्णस्य शकुनेस्तथा ॥ १४१ ॥ धृतराष्ट्रश्चिरं ध्यात्वा संजयं वाक्यमब्रवीत् । शृणु संजय सर्वं मे न चासूयितुमर्हसि ॥ १४२ ॥