महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रुतवानसि मेधावी बुद्धिमान् प्राज्ञसम्मतः । न विग्रहे मम मतिर्न च प्रीये कुलक्षये ॥ १४३ ॥ जब युद्धमें पाण्डवोंकी जीत होती गयी, तब यह अत्यन्त अप्रिय समाचार सुनकर तथा दुर्योधन, कर्ण और शकुनिके दुराग्रहपूर्ण निश्चित विचार जानकर धृतराष्ट्र बहुत देरतक चिन्तामें पड़े रहे। फिर उन्होंने संजयसे कहा—'संजय! मेरी सब बातें सुन लो। फिर इस युद्ध या विनाशके लिये मुझे दोष न दे सकोगे। तुम विद्वान्, मेधावी, बुद्धिमान् और पण्डितके लिये भी आदरणीय हो। इस युद्धमें मेरी सम्मति बिलकुल नहीं थी और यह जो हमारे कुलका विनाश हो गया है, इससे मुझे तनिक भी प्रसन्नता नहीं हुई है ॥ १४१—१४३ ॥
न मे विशेषः पुत्रेषु स्वेषु पाण्डुसुतेषु वा । वृद्धं मामभ्यसूयन्ति पुत्रा मन्युपरायणाः ॥ १४४ ॥ मेरे लिये अपने पुत्रों और पाण्डवोंमें कोई भेद नहीं था। किंतु क्या करूँ? मेरे पुत्र क्रोधके वशीभूत हो मुझपर ही दोषारोपण करते थे और मेरी बात नहीं मानते थे ॥ १४४ ॥
अहं त्वचक्षुः कार्पण्यात् पुत्रप्रीत्या सहामि तत् । मुह्यन्तं चानुमुह्यामि दुर्योधनमचेतनम् ॥ १४५ ॥ मैं अंधा हूँ, अतः कुछ दीनताके कारण और कुछ पुत्रोंके प्रति अधिक आसक्ति होनेसे भी वह सब अन्याय सहता आ रहा हूँ। मन्दबुद्धि दुर्योधन जब मोहवश दुःखी होता था, तब मैं भी उसके साथ दुःखी हो जाता था ॥ १४५ ॥
राजसूये श्रियं दृष्ट्वा पाण्डवस्य महौजसः । तच्चावहसनं प्राप्य सभारोहणदर्शने ॥ १४६ ॥ अमर्षणः स्वयं जेतुमशक्तः पाण्डवान् रणे । निरुत्साहश्च सम्प्राप्तुं सुश्रियं क्षत्रियोऽपि सन् ॥ १४७ ॥ गान्धारराजसहितश्छद्मद्यूतममन्त्रयत् । तत्र यद् यद् यथा ज्ञातं मया संजय तच्छृणु ॥ १४८ ॥ राजसूय-यज्ञमें महापराक्रमी पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी सर्वोपरि समृद्धि-सम्पत्ति देखकर तथा सभाभवनकी सीढ़ियोंपर चढ़ते और उस भवनको देखते समय भीमसेनके द्वारा उपहास पाकर दुर्योधन भारी अमर्षमें भर गया था। युद्धमें पाण्डवोंको हरानेकी शक्ति तो उसमें थी नहीं; अतः क्षत्रिय होते हुए भी वह युद्धके लिये उत्साह नहीं दिखा सका। परंतु पाण्डवोंकी उस उत्तम सम्पत्तिको हथियानेके लिये उसने गान्धारराज शकुनिको साथ लेकर कपटपूर्ण द्यूत खेलनेका ही निश्चय किया। संजय! इस प्रकार जूआ खेलनेका निश्चय हो जानेपर उसके पहले और पीछे जो-जो घटनाएँ घटित हुई हैं उन सबका विचार करते हुए मैंने समय-समयपर विजयकी आशाके विपरीत जो-जो अनुभव किया है उसे कहता हूँ, सुनो—॥ १४६-१४८ ॥