भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 49

श्रुत्वा तु मम वाक्यानि बुद्धियुक्तानि तत्त्वतः । ततो ज्ञास्यसि मां सौते प्रज्ञाचक्षुष्मित्युत ॥ १४९ ॥ सूतनन्दन! मेरे उन बुद्धिमत्तापूर्ण वचनोंको सुनकर तुम ठीक-ठीक समझ लोगे कि मैं कितना प्रज्ञाचक्षु हूँ ॥ १४९ ॥

यदाश्रौषं धनुरानम्य चित्रं विद्धं लक्ष्यं पतितं वै पृथिव्याम् । कृष्णां हृतां प्रेक्षतां सर्वराज्ञां तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५० ॥ संजय! जब मैंने सुना कि अर्जुनने धनुषपर बाण चढ़ाकर अद्भुत लक्ष्य बेध दिया और उसे धरतीपर गिरा दिया। साथ ही सब राजाओंके सामने, जबकि वे टुकुर-टुकुर देखते ही रह गये, बलपूर्वक द्रौपदीको ले आया, तभी मैंने विजयकी आशा छोड़ दी थी ॥ १५० ॥

यदाश्रौषं द्वारकायां सुभद्रां प्रसह्योढां माधवीमर्जुनेन । इन्द्रप्रस्थं वृष्णिवीरौ च यातौ तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५१ ॥ संजय! जब मैंने सुना कि अर्जुनने द्वारकामें मधुवंशकी राजकुमारी (और श्रीकृष्णकी बहिन) सुभद्राको बलपूर्वक हरण कर लिया और श्रीकृष्ण एवं बलराम (इस घटनाका विरोध न कर) दहेज लेकर इन्द्रप्रस्थमें आये, तभी समझ लिया था कि मेरी विजय नहीं हो सकती ॥ १५१ ॥

यदाश्रौषं देवराजं प्रविष्टं शरैर्दिव्यैर्वारितं चार्जनेन । अग्निं तथा तर्पितं खाण्डवे च तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५२ ॥ जब मैंने सुना कि खाण्डवदाहके समय देवराज इन्द्र तो वर्षा करके आग बुझाना चाहते थे और अर्जुनने उसे अपने दिव्य बाणोंसे रोक दिया तथा अग्निदेवको तृप्त किया, संजय! तभी मैंने समझ लिया कि अब मेरी विजय नहीं हो सकती ॥ १५२ ॥

यदाश्रौषं जातुषाद् वेश्मनस्तान् मुक्तान् पार्थान् पञ्च कुन्त्या समेतान् । युक्तं चैषां विदुरं स्वार्थसिद्धौ तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५३ ॥ जब मैंने सुना कि लाक्षाभवनसे अपनी मातासहित पाँचों पाण्डव बच गये हैं और स्वयं विदुर उनकी स्वार्थसिद्धिके प्रयत्नमें तत्पर हैं, संजय! तभी मैंने विजयकी आशा छोड़ दी थी ॥ १५३ ॥