भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 472

अन्यमुत्पादयामास पुत्रं भृगुरनिन्दितम् ॥ ४४ ॥
ब्रह्माजीने जब भृगुपुत्र शुक्रको जगत्‌के योगक्षेमके कार्यमें नियुक्त कर दिया, तब महर्षि भृगुने एक दूसरे निर्दोष पुत्रको जन्म दिया ॥ ४४ ॥
च्यवनं दीप्ततपसं धर्मात्मानं यशस्विनम् ।
यः स रोषाच्च्युतो गर्भान्मातुर्मोक्षाय भारत ॥ ४५ ॥
जिसका नाम था च्यवन। महर्षि च्यवनकी तपस्या सदा उद्दीप्त रहती है। वे धर्मात्मा और यशस्वी हैं। भारत! वे अपनी माताको संकटसे बचानेके लिये रोषपूर्वक गर्भसे च्युत हो गये थे (इसीलिये च्यवन कहलाये) ॥ ४५ ॥
आरुषी तु मनोः कन्या तस्य पत्नी मनीषिणः ।
और्वस्तस्यां समभवदूरूं भित्त्वा महायशाः ॥ ४६ ॥
मनुकी पुत्री आरुषी मनीषी च्यवन मुनिकी पत्नी थी। उससे महायशस्वी और्व मुनिका जन्म हुआ। वे अपनी माताकी ऊरु (जाँघ) फाड़कर प्रकट हुए थे; इसलिये और्व कहलाये ॥ ४६ ॥
महातेजा महावीर्यो बाल एव गुणैर्युतः ।
ऋचीकस्तस्य पुत्रस्तु जमदग्निस्ततोऽभवत् ॥ ४७ ॥
वे महान् तेजस्वी और अत्यन्त शक्तिशाली थे। बचपनमें ही अनेक सद्गुण उनकी शोभा बढ़ाने लगे। और्वके पुत्र ऋचीक तथा ऋचीकके पुत्र जमदग्नि हुए ॥ ४७ ॥
जमदग्नेस्तु चत्वार आसन् पुत्रा महात्मनः ।
रामस्तेषां जघन्योऽभूदजघन्यैर्गुणैर्युतः ।
सर्वशस्त्रेषु कुशलः क्षत्रियान्तकरो वशी ॥ ४८ ॥
महात्मा जमदग्निके चार पुत्र थे, जिनमें परशुरामजी सबसे छोटे थे; किंतु उनके गुण छोटे नहीं थे। वे श्रेष्ठ सद्गुणोंसे विभूषित थे, सम्पूर्ण शस्त्रविद्यामें कुशल, क्षत्रिय-कुलका संहार करनेवाले तथा जितेन्द्रिय थे ॥ ४८ ॥
और्वस्यासीत् पुत्रशतं जमदग्निपुरोगमम् ।
तेषां पुत्रसहस्राणि बभूवुर्भुवि विस्तरः ॥ ४९ ॥
और्व मुनिके जमदग्नि आदि सौ पुत्र थे। फिर उनके भी सहस्रों पुत्र हुए। इस प्रकार इस पृथ्वीपर भृगुवंशका विस्तार हुआ ॥ ४९ ॥
द्वौ पुत्रौ ब्रह्मणस्त्वन्यौ ययोस्तिष्ठति लक्षणम् ।
लोके धाता विधाता च यौ स्थितौ मनुना सह ॥ ५० ॥
ब्रह्माजीके दो पुत्र और थे, जिनका धारण-पोषण और सृष्टिरूप लक्षण लोकमें सदा ही उपलब्ध होता है। उनके नाम हैं धाता और विधाता। ये मनुके साथ रहते हैं ॥ ५० ॥