महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 473, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतयोरेव स्वसा देवी लक्ष्मीः पद्मगृहा शुभा । तस्यास्तु मानसाः पुत्रास्तुरगा व्योमचारिणः ॥ ५१ ॥ वरुणस्य भार्या या ज्येष्ठा शुक्राद् देवी व्यजायत । तस्याः पुत्रं बलं विद्धि सुरां च सुरनन्दिनीम् ॥ ५२ ॥ कमलोंमें निवास करनेवाली शुभस्वरूपा लक्ष्मीदेवी उन दोनोंकी बहिन हैं। आकाशमें विचरनेवाले अश्व लक्ष्मीदेवीके मानस पुत्र हैं। राजन्! वरुणके बीजसे उनकी ज्येष्ठ पत्नी देवीने एक पुत्र और एक पुत्रीको जन्म दिया। उसके पुत्रको तो बल और देवनन्दिनी पुत्रीको सुरा समझो ॥ ५१-५२ ॥
प्रजानामन्नकामानामन्योन्यपरिभक्षणात् । अधर्मस्तत्र संजातः सर्वभूतविनाशकः ॥ ५३ ॥ तदनन्तर एक समय ऐसा आया, जब प्रजा भूखसे पीड़ित हो भोजनकी इच्छासे एक-दूसरेको मारकर खाने लगी, उस समय वहाँ अधर्म प्रकट हुआ, जो समस्त प्राणियोंका नाश करनेवाला है ॥ ५३ ॥
तस्यापि निर्ऋतिर्भार्या नैर्ऋता येन राक्षसाः । घोरास्तस्यास्त्रयः पुत्राः पापकर्मरताः सदा ॥ ५४ ॥ अधर्मकी स्त्री निर्ऋति हुई, जिससे नैर्ऋत नामवाले तीन भयंकर राक्षस पुत्र उत्पन्न हुए, जो सदा पापकर्ममें ही लगे रहनेवाले हैं ॥ ५४ ॥
भयो महाभयश्चैव मृत्युर्भूतान्तकस्तथा । न तस्य भार्या पुत्रो वा कश्चिदस्त्यन्तको हि सः ॥ ५५ ॥ उनके नाम इस प्रकार हैं—भय, महाभय और मृत्यु। उनमें मृत्यु समस्त प्राणियोंका अन्त करनेवाला है। उसके पत्नी या पुत्र कोई नहीं है, क्योंकि वह सबका अन्त करनेवाला है ॥ ५५ ॥
काकीं श्येनीं तथा भासीं धृतराष्ट्रीं तथा शुकीम् । ताम्रा तु सुषुवे देवी पञ्चैता लोकविश्रुताः ॥ ५६ ॥ देवी ताम्राने काकी, श्येनी, भासी, धृतराष्ट्री तथा शुकी—इन पाँच लोकविख्यात कन्याओंको उत्पन्न किया ॥ ५६ ॥
उलूकान् सुषुवे काकी श्येनी श्येनान् व्यजायत । भासी भासानजनयद् गृध्रांश्चैव जनाधिप ॥ ५७ ॥ जनेश्वर! काकीने उल्लुओं और श्येनीने बाजोंको जन्म दिया; भासीने मुर्गों तथा गीधोंको उत्पन्न किया ॥ ५७ ॥
धृतराष्ट्री तु हंसांश्च कलहंसांश्च सर्वशः । चक्रवाकांश्च भद्रा तु जनयामास सैव तु ॥ ५८ ॥ शुकी च जनयामास शुकानेव यशस्विनी ।