भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 477, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 477

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तषष्टितमोऽध्यायः

देवता और दैत्य आदिके अंशावतारोंका दिग्दर्शन

जनमेजय उवाच

देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
सिंहव्याघ्रमृगाणां च पन्नगानां पतत्त्रिणाम् ॥ १ ॥
सर्वेषां चैव भूतानां सम्भवं भगवन्नहम् ।
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन मानुषेषु महात्मनाम् ।
जन्म कर्म च भूतानामेतेषामनुपूर्वशः ॥ २ ॥
जनमेजयने कहा— भगवन्! मैं मनुष्य-योनिमें अंशतः उत्पन्न हुए देवता, दानव, गन्धर्व, नाग, राक्षस, सिंह, व्याघ्र, हरिण, सर्प, पक्षी एवं सम्पूर्ण भूतोंके जन्मका वृत्तान्त यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ। मनुष्योंमें जो महात्मा पुरुष हैं, उनके तथा इन सभी प्राणियोंके जन्म-कर्मका क्रमशः वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

मानुषेषु मनुष्येन्द्र सम्भूता ये दिवौकसः ।
प्रथमं दानवांश्चैव तांस्ते वक्ष्यामि सर्वशः ॥ ३ ॥
विप्रचित्तिरिति ख्यातो य आसीद् दानवर्षभः ।
जरासन्ध इति ख्यातः स आसीन्मनुजर्षभः ॥ ४ ॥
दितेः पुत्रस्तु यो राजन् हिरण्यकशिपुः स्मृतः ।
स जज्ञे मानुषे लोके शिशुपालो नरर्षभः ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजी बोले— नरेन्द्र! मनुष्योंमें जो देवता और दानव प्रकट हुए थे, उन सबके जन्मका ही पहले तुम्हें परिचय दे रहा हूँ। विप्रचित्ति नामसे विख्यात जो दानवोंका राजा था, वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ जरासन्ध नामसे विख्यात हुआ। राजन्! हिरण्यकशिपु नामसे प्रसिद्ध जो दितिका पुत्र था, वही मनुष्यलोकमें नरश्रेष्ठ शिशुपालके रूपमें उत्पन्न हुआ ॥ ३-५ ॥
संहाद इति विख्यातः प्रह्लादस्यानुजस्तु यः ।
स शल्य इति विख्यातो जज्ञे बाह्लीकपुङ्गवः ॥ ६ ॥
अनुह्रादस्तु तेजस्वी योऽभूत् ख्यातो जघन्यजः ।
धृष्टकेतुरिति ख्यातः स बभूव नरेश्वरः ॥ ७ ॥
प्रह्लादका छोटा भाई जो संहादके नामसे विख्यात था, वही बाह्लीक देशका सुप्रसिद्ध राजा शल्य हुआ। प्रह्लादका ही दूसरा छोटा भाई जिसका नाम अनुह्राद था, धृष्टकेतु नामक राजा हुआ ॥ ६-७ ॥