भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 492

सा नियुक्ता पितुर्गृहे ब्राह्मणातिथिपूजने । उग्रं पर्यचरद् घोरं ब्राह्मणं संशितव्रतम् ॥ १३२ ॥ निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदुः । तमुग्रं शंसितात्मानं सर्वयत्नैर्अतोषयत् ॥ १३३ ॥ पिताके घरपर रहते समय पृथाको ब्राह्मणों और अतिथियोंके स्वागत-सत्कारका कार्य सौंपा गया था। एक दिन उसने कठोर व्रतका पालन करनेवाले भयंकर क्रोधी तथा उग्र प्रकृतिवाले एक ब्राह्मण महर्षिकी, जो धर्मके विषयमें अपने निश्चयको छिपाये रखते थे और लोग जिन्हें दुर्वासाके नामसे जानते हैं, सेवा की। वे ऊपरसे तो उग्र स्वभावके थे, परंतु उनका हृदय महान् होनेके कारण सबके द्वारा प्रशंसित था। पृथाने पूरा प्रयत्न करके अपनी सेवाओंद्वारा मुनिको संतुष्ट किया ॥ १३२-१३३ ॥ तुष्टोऽभिचारसंयुक्तमाचचक्षे यथाविधि । उवाच चैनां भगवान् प्रीतोऽस्मि सुभगे तव ॥ १३४ ॥ भगवान् दुर्वासाने संतुष्ट होकर पृथाको प्रयोग-विधिसहित एक मन्त्रका विधिपूर्वक उपदेश किया और कहा—'सुभगे! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ १३४ ॥ यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि । तस्य तस्य प्रसादात् त्वं देवि पुत्राञ्जनिष्यसि ॥ १३५ ॥ 'देवि! तुम इस मन्त्रद्वारा जिस-जिस देवताका आवाहन करोगी, उसी-उसीके कृपाप्रसादसे पुत्र उत्पन्न करोगी' ॥ १३५ ॥ एवमुक्ता च सा बाला तदा कौतूहलान्विता । कन्या सती देवमर्कमाजुहाव यशस्विनी ॥ १३६ ॥ दुर्वासाके ऐसा कहनेपर वह सती-साध्वी यशस्विनी बाला यद्यपि अभी कुमारी कन्या थी, तो भी कौतूहलवश उसने भगवान् सूर्यका आवाहन किया ॥ १३६ ॥ प्रकाशकर्ता भगवांस्तस्यां गर्भं दधौ तदा । अजीजनत् सुतं चास्यां सर्वशस्त्रभृतां वरम् ॥ १३७ ॥ तब सम्पूर्ण जगत्में प्रकाश फैलानेवाले भगवान् सूर्यने कुन्तीके उदरमें गर्भ स्थापित किया और उस गर्भसे एक ऐसे पुत्रको जन्म दिया, जो समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ था ॥ १३७ ॥ सकुण्डलं सकवचं देवगर्भश्रियान्वितम् । दिवाकरसमं दीप्त्या चारुसर्वाङ्गभूषितम् ॥ १३८ ॥ वह कुण्डल और कवचके साथ ही प्रकट हुआ था। देवताओंके बालकोंमें जो सहज कान्ति होती है, उसीसे वह सुशोभित था। अपने तेजसे वह सूर्यके समान जान पड़ता था। उसके सभी अंग मनोहर थे, जो उसके सम्पूर्ण शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १३८ ॥ निगूहमाना जातं वै बन्धुपक्षभयात् तदा ।