महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्ससर्ज जले कुन्ती तं कुमारं यशस्विनम् ॥ १३९ ॥ उस समय कुन्तीने पिता-माता आदि बान्धव-पक्षके भयसे उस यशस्वी कुमारको छिपाकर एक पेटीमें रखकर जलमें छोड़ दिया ॥ १३९ ॥ तमुत्सृष्टं जले गर्भं राधाभर्ता महायशाः । राधायाः कल्पयामास पुत्रं सोऽधिरथस्तदा ॥ १४० ॥ जलमें छोड़े हुए उस बालकको राधाके पति महायशस्वी अधिरथ सूतने लेकर राधाकी गोदमें दे दिया और उसे राधाका पुत्र बना लिया ॥ १४० ॥ चक्रतुर्नामधेयं च तस्य बालस्य तावुभौ । दम्पती वसुषेणेति दिक्षु सर्वासु विश्रुतम् ॥ १४१ ॥ उन दोनों दम्पतिने उस बालकका नाम वसुषेण रखा। वह सम्पूर्ण दिशाओंमें भलीभाँति विख्यात था ॥ १४१ ॥ संवर्धमानो बलवान् सर्वास्त्रेषूत्तमोऽभवत् । वेदाङ्गानि च सर्वाणि जजाप जयतां वरः ॥ १४२ ॥ बड़ा होनेपर वह बलवान् बालक सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंको चलानेकी कलामें उत्तम हुआ। उस विजयी वीरने सम्पूर्ण वेदांगोंका अध्ययन कर लिया ॥ १४२ ॥ यस्मिन् काले जपन्नास्ते धीमान् सत्यपराक्रमः । नादेयं ब्राह्मणेष्वासीत् तस्मिन् काले महात्मनः ॥ १४३ ॥ वसुषेण (कर्ण) बड़ा बुद्धिमान् और सत्यपराक्रमी था। जिस समय वह जपमें लगा होता, उस समय उस महात्माके पास ऐसी कोई वस्तु नहीं थी, जिसे वह ब्राह्मणोंके माँगनेपर न दे डाले ॥ १४३ ॥ तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा पुत्रार्थे भूतभावनः । ययाचे कुण्डले वीरं कवचं च सहाङ्गजम् ॥ १४४ ॥ भूतभावन इन्द्रने अपने पुत्र अर्जुनके हितके लिये ब्राह्मणका रूप धारण करके वीर कर्णसे दोनों कुण्डल तथा उसके शरीरके साथ ही उत्पन्न हुआ कवच माँगा ॥ १४४ ॥ उत्कृत्य कर्णो ह्यददात् कवचं कुण्डले तथा । शक्तिं शक्रो ददौ तस्मै विस्मितश्चेदमब्रवीत् ॥ १४५ ॥ देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् । यस्मिन् क्षेप्स्यसि दुर्धर्ष स एको न भविष्यति ॥ १४६ ॥ कर्णने अपने शरीरमें चिपके हुए कवच और कुण्डलोंको उधेड़कर दे दिया। इन्द्रने विस्मित होकर कर्णको एक शक्ति प्रदान की और कहा—'दुर्धर्ष वीर! तुम देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग और राक्षसोंमेंसे जिसपर भी इस शक्तिको चलाओगे, वह एक व्यक्ति निश्चय ही अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा' ॥ १४५-१४६ ॥ पुरा नाम च तस्यासीद् वसुषेण इति क्षितौ ।