भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 508

मालिनीमभितो राजन् नदीं पुण्यां सुखोदकाम् ॥ २१ ॥ बड़े-बड़े तूनके वृक्षोंसे उस आश्रमकी शोभा बहुत बढ़ गयी थी। राजन्! बीचमें पुण्यसलिला मालिनी नदी बहती थी, जिसका जल बड़ा ही सुखद एवं स्वादिष्ट था। उसके दोनों तटोंपर वह आश्रम फैला हुआ था॥ २१॥ नैकपक्षिगणाकीर्णां तपोवनमनोरमाम् । तत्र व्यालमृगान् सौम्यान् पश्यन् प्रीतिमवाप सः ॥ २२ ॥ मालिनीमें अनेक प्रकारके जलपक्षी निवास करते थे तथा तटवर्ती तपोवनके कारण उसकी मनोहरता और बढ़ गयी थी। वहाँ विषधर सर्प और हिंसक वनजन्तु भी सौम्यभाव (हिंसाशून्य कोमलवृत्ति)-से रहते थे। यह सब देखकर राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ २२॥ तं चाप्रतिरथः श्रीमाना श्रमं प्रत्यपद्यत । देवलोकप्रतीकाशं सर्वतः सुमनोहरम् ॥ २३ ॥ श्रीमान् दुष्यन्त नरेश अप्रतिरथ वीर थे—उस समय उनकी समानता करनेवाला भूमण्डलमें दूसरा कोई रथी योद्धा नहीं था। वे उक्त आश्रमके समीप जा पहुँचे, जो देवताओंके लोक-सा प्रतीत होता था। वह आश्रम सब ओरसे अत्यन्त मनोहर था॥ २३॥ नदीं चाश्रमसंश्लिष्टां पुण्यतोयां ददर्श सः । सर्वप्राणभृतां तत्र जननीमिव धिष्ठिताम् ॥ २४ ॥ राजाने आश्रमसे सटकर बहनेवाली पुण्यसलिला मालिनी नदीकी ओर भी दृष्टिपात किया; जो वहाँ समस्त प्राणियोंकी जननी-सी विराज रही थी॥ २४॥ सचक्रवाकपुलिनां पुष्पफेनप्रवाहिनीम् । सकिन्नरगणावासां वानरर्क्षनिषेविताम् ॥ २५ ॥ उसके तटपर चकवा-चकई किलोल कर रहे थे। नदीके जलमें बहुत-से फूल इस प्रकार बह रहे थे, मानो फेन हों। उसके तटप्रान्तमें किन्नरोंके निवास-स्थान थे। वानर और रीछ भी उस नदीका सेवन करते थे॥ २५॥ पुण्यस्वाध्यायसंघुष्टां पुलिनैरुपशोभिताम् । मत्तवारणशार्दूलभुजगेन्द्रनिषेविताम् ॥ २६ ॥ अनेक सुन्दर पुलिन मालिनीकी शोभा बढ़ा रहे थे। वेद-शास्त्रोंके पवित्र स्वाध्यायकी ध्वनिसे उस सरिताका निकटवर्ती प्रदेश गूँज रहा था। मतवाले हाथी, सिंह और बड़े-बड़े सर्प भी मालिनीके तटका आश्रय लेकर रहते थे॥ २६॥ तस्यास्तीरे भगवतः काश्यपस्य महात्मनः । आश्रमप्रवरं रम्यं महर्षिगणसेवितम् ॥ २७ ॥ उसके तटपर ही कश्यपगोत्रीय महात्मा कण्वका वह उत्तम एवं रमणीय आश्रम था। वहाँ महर्षियोंके समुदाय निवास करते थे॥ २७॥ नदीमाश्रमसम्बद्धां दृष्ट्वाऽऽश्रमपदं तथा ।