महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचकाराभिप्रवेशाय मतिं स नृपतिस्तदा ॥ २८ ॥ उस मनोहर आश्रम और आश्रमसे सटी हुई नदीको देखकर राजाने उस समय उसमें प्रवेश करनेका विचार किया ॥ २८ ॥
अलंकृतं द्वीपवत्या मालिन्या रम्यतीरया । नरनारायणस्थानं गङ्गयेवोपशोभितम् ॥ २९ ॥ टापुओंसे युक्त तथा सुरम्य तटवाली मालिनी नदीसे सुशोभित वह आश्रम गंगा नदीसे शोभायमान भगवान् नर-नारायणके आश्रम-सा जान पड़ता था ॥ २९ ॥
मत्तबर्हिणसंघुष्टं प्रविवेश महद् वनम् । तत् स चैत्ररथप्रख्यं समुपेत्य नरर्षभः ॥ ३० ॥ अतीवगुणसम्पन्नमनिर्देश्यं च वर्चसा । महर्षिं काश्यपं द्रष्टुमथ कण्वं तपोधनम् ॥ ३१ ॥ ध्वजिनीमश्वसम्बाधां पदातिगजसंकुलाम् । अवस्थाप्य वनद्वारि सेनामिदमुवाच सः ॥ ३२ ॥ तदनन्तर नरश्रेष्ठ दुष्यन्तने अत्यन्त उत्तम गुणोंसे सम्पन्न कश्यपगोत्रीय महर्षि तपोधन कण्वका, जिनके तेजका वाणीद्वारा वर्णन नहीं किया जा सकता था, दर्शन करनेके लिये कुबेरके चैत्ररथवनके समान मनोहर उस महान् वनमें प्रवेश किया, जहाँ मतवाले मयूर अपनी केकाध्वनि फैला रहे थे। वहाँ पहुँचकर नरेशने रथ, घोड़े, हाथी और पैदलोंसे भरी हुई अपनी चतुरंगिणी सेनाको उस तपोवनके किनारे ठहरा दिया और कहा— ॥ ३०—३२ ॥
मुनिं विरजसं द्रष्टुं गमिष्यामि तपोधनम् । काश्यपं स्थीयतामत्र यावदागमनं मम ॥ ३३ ॥ ‘सेनापति! और सैनिको! मैं रजोगुणरहित तपस्वी महर्षि कश्यपनन्दन कण्वका दर्शन करनेके लिये उनके आश्रममें जाऊँगा। जबतक मैं वहाँसे लौट न आऊँ, तबतक तुमलोग यहीं ठहरो’ ॥ ३३ ॥
तद् वनं नन्दनप्रख्यमासाद्य मनुजेश्वरः । क्षुत्पिपासे जहौ राजा मुदं चावाप पुष्कलाम् ॥ ३४ ॥ इस प्रकार आदेश दे नरेश्वर दुष्यन्तने नन्दनवनके समान सुशोभित उस तपोवनमें पहुँचकर भूख-प्यासको भुला दिया। वहाँ उन्हें बड़ा आनन्द मिला ॥ ३४ ॥
सामात्यो राजलिङ्गानि सोऽपनीय नराधिपः । पुरोहितसहायश्च जगामाश्रममुत्तमम् ॥ ३५ ॥ वे नरेश मुकुट आदि राजचिह्नोंको हटाकर साधारण वेश-भूषामें मन्त्रियों और पुरोहितके साथ उस उत्तम आश्रमके भीतर गये ॥ ३५ ॥
दिदृक्षुस्तत्र तमृषिं तपोराशिवमथाव्ययम् ।