महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 530, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंशकुन्तला ह्यश्रुमुखी पपात नृपपादयोः ॥ तां देवीं पुनरुत्थाप्य मा शुचेति पुनः पुनः । शपेयं सुकृतेनैव प्रापयिष्ये नृपात्मजे ॥) अनिन्द्यगामिनी शकुन्तलासे ऐसा कहकर राजर्षि दुष्यन्तने उसे अपनी भुजाओंमें भर लिया और उसकी ओर मुसकराते हुए देखा। देवी शकुन्तला राजाकी परिक्रमा करके खड़ी थी। उस समय उन्होंने उसे हृदयसे लगा लिया। शकुन्तलाके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली और वह नरेशके चरणोंमें गिर पड़ी। राजाने देवी शकुन्तलाको फिर उठाकर बार-बार कहा—'राजकुमारी! चिन्ता न करो। मैं अपने पुण्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, तुम्हें अवश्य बुला लूँगा।'
वैशम्पायन उवाच
इति तस्याः प्रतिश्रुत्य स नृपो जनमेजय । मनसा चिन्तयन् प्रायात् काश्यपं प्रति पार्थिवः ॥ २२ ॥ भगवांस्तपसा युक्तः श्रुत्वा किं नु करिष्यति । एवं स चिन्तयन्नेव प्रविवेश स्वकं पुरम् ॥ २३ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार शकुन्तलासे प्रतिज्ञा करके नरेश्वर राजा दुष्यन्त आश्रमसे चल दिये। उनके मनमें महर्षि कण्वकी ओरसे बड़ी चिन्ता थी कि तपस्वी भगवान् कण्व यह सब सुनकर न जाने क्या कर बैठेंगे? इस तरह चिन्ता करते हुए ही राजाने अपने नगरमें प्रवेश किया ॥ २२-२३ ॥
मुहूर्तयाते तस्मिंस्तु कण्वोऽप्याश्रममागमत् । शकुन्तला च पितरं ह्रिया नोपजगाम तम् ॥ २४ ॥ उनके गये दो ही घड़ी बीती थी कि महर्षि कण्व भी आश्रमपर आ गये; परंतु शकुन्तला लज्जावश पहलेके समान पिताके समीप नहीं गयी ॥ २४ ॥
(शङ्कितैव च विप्रर्षिमुपचक्राम सा शनैः । ततोऽस्य राजञ्जग्राह आसनं चाप्यकल्पयत् ॥ शकुन्तला च सव्रीडा तमृषिं नाभ्यभाषत । तस्मात् स्वधर्मात् स्खलिता भीता सा भरतर्षभ ॥ अभवद् दोषदर्शित्वाद् ब्रह्मचारिण्ययन्त्रिता । स तदा व्रीडितां दृष्ट्वा ऋषिस्तां प्रत्यभाषत ॥ तत्पश्चात् वह डरती हुई ब्रह्मर्षिके निकट धीरे-धीरे गयी। फिर उसने उनके लिये आसन लेकर बिछाया। शकुन्तला इतनी लज्जित हो गयी थी कि महर्षिसे कोई बाततक न कर सकी। भरतश्रेष्ठ! वह अपने धर्मसे गिर जानेके कारण भयभीत हो रही थी। जो कुछ समय