महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें**कण्व बोले—**वत्स! चन्द्रवंशमें दुष्यन्त नामसे प्रसिद्ध एक राजा हैं। पवित्र व्रतका पालन करनेवाली यह तुम्हारी माता उन्हींकी महारानी है। यह सुन्दरी तुम्हें साथ लेकर अब पतिकी सेवामें जाना चाहती है। तुम वहाँ जाकर राजाको प्रणाम करके युवराज-पद प्राप्त करोगे। वे महाराज दुष्यन्त ही तुम्हारे पिता हैं। तुम सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहना और बाप-दादेके राज्यका प्रेमपूर्वक पालन करना।
शकुन्तले शृणुष्वेदं हितं पथ्यं च भामिनि । पतिव्रताभावगुणान् हित्वा साध्यं न किञ्चन ॥ पतिव्रतानां देवा वै तुष्टाः सर्ववरप्रदाः । प्रसादं च करिष्यन्ति ह्यापदर्थे च भामिनि ॥ पतिप्रसादात् पुण्यगतिं प्राप्नुवन्ति न चाशुभम् । तस्माद् गत्वा तु राजानमाराधय शुचिस्मिते ॥) (फिर कण्व शकुन्तलासे बोले—) 'भामिनि! शकुन्तले! यह मेरी हितकर एवं लाभप्रद बात सुनो। पतिव्रताभाव-सम्बन्धी गुणोंको छोड़कर तुम्हारे लिये और कोई वस्तु साध्य नहीं है। पतिव्रताओंपर सम्पूर्ण वरोंको देनेवाले देवतालोग भी संतुष्ट रहते हैं। भामिनि! वे आपत्तिके निवारणके लिये अपने कृपा-प्रसादका भी परिचय देंगे। शुचिस्मिते! पतिव्रता देवियाँ पतिके प्रसादसे पुण्यगतिको ही प्राप्त होती हैं; अशुभ गतिको नहीं। अतः तुम जाकर राजाकी आराधना करो'।
तस्य तद् बलमाज्ञाय कण्वः शिष्यानुवाच ह ॥ १० ॥ शकुन्तलामिमां शीघ्रं सहपुत्रामितो गृहात् । भर्तुः प्रापयतागारं सर्वलक्षणपूजिताम् ॥ ११ ॥ फिर उस बालकके बलको समझकर कण्वने अपने शिष्योंसे कहा—'तुमलोग समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्मानित मेरी पुत्री शकुन्तला और इसके पुत्रको शीघ्र ही इस घरसे ले जाकर पतिके घरमें पहुँचा दो ।। १०-११ ।।
नारीणां चिरवासो हि बान्धवेषु न रोचते । कीर्तिचारित्रधर्मघ्नस्तस्मान्नयत मा चिरम् ॥ १२ ॥ 'स्त्रियोंका अपने भाई-बन्धुओंके यहाँ अधिक दिनोंतक रहना अच्छा नहीं होता। वह उनकी कीर्ति, शील तथा पातिव्रत्य धर्मका नाश करनेवाला होता है। अतः इसे अविलम्ब पतिके घरमें पहुँचा दो' ।। १२ ।।
(वैशम्पायन उवाच
धर्माभिपूजितं पुत्रं काश्यपेन निशाम्य तु । काश्यपात् प्राप्य चानुज्ञां मुमुदे च शकुन्तला ॥