महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कश्यपनन्दन कण्वने धर्मानुसार मेरे पुत्रका बड़ा आदर किया है, यह देखकर तथा उनकी ओरसे पतिके घर जानेकी आज्ञा पाकर शकुन्तला मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई।
कण्वस्य वचनं श्रुत्वा प्रतिगच्छेति चासकृत् ।
तथेत्युक्त्वा तु कण्वं च मातरं पौरवोऽब्रवीत् ॥
किं चिरायसि मातस्त्वं गमिष्यामो नृपालयम् ।
कण्वके मुखसे बारंबार ‘जाओ-जाओ’ यह आदेश सुनकर पूरूनन्दन सर्वदमनने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और मातासे कहा—‘माँ! तुम क्यों विलम्ब करती हो, चलो राजमहल चलें’।
एवमुक्त्वा तु तां देवीं दुष्पन्तस्य महात्मनः ॥
अभिवाद्य मुनेः पादौ गन्तुमैच्छत् स पौरवः ।
देवी शकुन्तलासे ऐसा कहकर पौरवराजकुमारने मुनिके चरणोंमें मस्तक झुकाकर महात्मा राजा दुष्पन्तके यहाँ जानेका विचार किया।
शकुन्तला च पितरमभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥
प्रदक्षिणीकृत्य तदा पितरं वाक्यमब्रवीत् ।
अज्ञानान्मे पिता चेति दुरुक्तं वापि चानृतम् ॥
अकार्यं वाप्यनिष्टं वा क्षन्तुमर्हसि काश्यप ।
शकुन्तलाने भी हाथ जोड़कर पिताको प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा करके उस समय यह बात कही—‘भगवन्! काश्यप! आप मेरे पिता हैं, यह समझकर मैंने अज्ञानवश यदि कोई कठोर या असत्य बात कह दी हो अथवा न करनेयोग्य या अप्रिय कार्य कर डाला हो, तो उसे आप क्षमा कर देंगे’।
एवमुक्तो नतशिरा मुनिर्नोवाच किञ्चन ॥
मनुष्यभावात् कण्वोऽपि मुनिरश्रूण्यवर्तयत् ।
शकुन्तलाके ऐसा कहनेपर सिर झुकाकर बैठे हुए कण्व मुनि कुछ बोल न सके; मानव-स्वभावके अनुसार करुणाका उदय हो जानेसे नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे।
अब्भक्षान् वायुभक्षांश्च शीर्णपर्णाशनान् मुनीन् ॥
फलमूलाशनो दान्तान् कृशान् धमनिसंततान् ।
व्रतिनो जटिलान् मुण्डान् वल्कलाजिनसंवृतान् ॥
उनके आश्रममें बहुत-से ऐसे मुनि रहते थे, जो जल पीकर, वायु पीकर अथवा सूखे पत्ते खाकर तपस्या करते थे। फल-मूल खाकर रहनेवाले भी बहुत थे। वे सब-के-सब जितेन्द्रिय एवं दुर्बल शरीरवाले थे। उनके शरीरकी नस-नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं। उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले उन महर्षियोंमेंसे कितने ही सिरपर जटा धारण करते थे