भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 863, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 863

'कहते हैं, पूर्वकालमें एक परम धर्मात्मा राजा हो गये हैं। उनका नाम था व्युषिताश्व। वे पूरुवंशकी वृद्धि करनेवाले थे ।। ७ ।। तस्मिंश्च यजमाने वै धर्मात्मनि महाभुजे । उपागमंस्ततो देवाः सेन्द्रा देवर्षिभिः सह ।। ८ ।। 'एक समय वे महाबाहु धर्मात्मा नरेश जब यज्ञ करने लगे, उस समय इन्द्र आदि देवता देवर्षियोंके साथ उस यज्ञमें पधारे थे ।। ८ ।। अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः । व्युषिताश्वस्य राजर्षेस्ततो यज्ञे महात्मनः ।। ९ ।। देवा ब्रह्मर्षयश्चैव चक्रुः कर्म स्वयं तदा । व्युषिताश्वस्ततो राजन्नति मर्त्यान् व्यरोचत ।। १० ।। 'उसमें देवराज इन्द्र सोमपान करके उन्मत्त हो उठे थे तथा ब्राह्मणलोग पर्याप्त दक्षिणा पाकर हर्षसे फूल उठे थे। महामना राजर्षि व्युषिताश्वके यज्ञमें उस समय देवता और ब्रह्मर्षि स्वयं सब कार्य कर रहे थे। राजन्! इससे व्युषिताश्व सब मनुष्योंसे ऊँची स्थितिमें पहुँचकर बड़ी शोभा पा रहे थे ।। ९-१० ।। सर्वभूतान् प्रति यथा तपनः शिशिरात्यये । स विजित्य गृहीत्वा च नृपतीन् राजसत्तमः ।। ११ ।। प्राच्यानुदीच्यान् पाश्चात्त्यान् दाक्षिणात्यानकालयत् । अश्वमेधे महायज्ञे व्युषिताश्वः प्रतापवान् ।। १२ ।। 'राजा व्युषिताश्व समस्त भूतोंके प्रीतिपात्र थे। राजाओंमें श्रेष्ठ प्रतापी व्युषिताश्वने अश्वमेध नामक महान् यज्ञमें पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण—चारों दिशाओंके राजाओंको जीतकर अपने वशमें कर लिया—ठीक जिस प्रकार शिशिरकालके अन्तमें भगवान् सूर्य-देव सभी प्राणियोंपर विजय कर लेते हैं—सबको तपाने लगते हैं ।। ११-१२ ।। बभूव स हि राजेन्द्रो दशनागबलान्वितः । अप्यत्र गाथां गायन्ति ये पुराणविदो जनाः ।। १३ ।। व्युषिताश्वे यशोवृद्धे मनुष्येन्द्रे कुरूत्तम । व्युषिताश्वः समुद्रान्तां विजित्येमां वसुंधराम् ।। १४ ।। अपालयत् सर्ववर्णान् पिता पुत्रानिवौरसान् । यजमानो महायज्ञैर्ब्राह्मणेभ्यो धनं ददौ ।। १५ ।। 'उन महाराजमें दस हाथियोंका बल था। कुरुश्रेष्ठ! पुराणवेत्ता विद्वान् यशमें बढ़े-चढ़े हुए नरेन्द्र व्युषिताश्वके विषयमें यह यशोगाथा गाते हैं—'राजा व्युषिताश्व समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वीको जीतकर जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंका पालन करता है, उसी प्रकार सभी वर्णके लोगोंका पालन करते थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करके ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया ।। १३—१५ ।।

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