महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 864, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनन्तरत्नान्यादाय स जहार महाक्रतून् । सुषाव च बहून् सोमान् सोमसंस्थास्ततान च ॥ १६ ॥ ‘अनन्त रत्नोंकी भेंट लेकर उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ किये। अनेक सोमयागोंका आयोजन करके उनमें बहुत-सा सोमरस संग्रह करके अग्निष्टोम-अत्यग्निष्टोम आदि सात प्रकारकी सोमयाग-संस्थाओंका भी अनुष्ठान किया’ ॥ १६ ॥ आसीत् काक्षीवती चास्य भार्या परमसम्मता । भद्रा नाम मनुष्येन्द्र रूपेणासदृशी भुवि ॥ १७ ॥ ‘नरेन्द्र! राजा कक्षीवान्की पुत्री भद्रा उनकी अत्यन्त प्यारी पत्नी थी। उन दिनों इस पृथ्वीपर उसके रूपकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री न थी’ ॥ १७ ॥ कामयामासतुस्तौ च परस्परमिति श्रुतम् । स तस्यां कामसम्पन्नो यक्ष्मणा समपद्यत ॥ १८ ॥ ‘मैंने सुना है, वे दोनों पति-पत्नी एक-दूसरेको बहुत चाहते थे। पत्नीके प्रति अत्यन्त कामासक्त होनेके कारण राजा व्युषिताश्व राजयक्ष्माके शिकार हो गये’ ॥ १८ ॥ तेनाचिरेण कालेन जगामास्तमिवांशुमान् । तस्मिन् प्रेते मनुष्येन्द्रे भार्यास्य भृशदुःखिता ॥ १९ ॥ ‘इस कारण वे थोड़े ही समयमें सूर्यकी भाँति अस्त हो गये। उन महाराजके परलोकवासी हो जानेपर उनकी पत्नीको बड़ा दुःख हुआ’ ॥ १९ ॥ अपुत्रा पुरुषव्याघ्र विललापेति नः श्रुतम् । भद्रा परमदुःखार्ता तन्निबोध जनाधिप ॥ २० ॥ ‘नरव्याघ्र जनेश्वर! हमने सुना है कि भद्राके तबतक कोई पुत्र नहीं हुआ था। इस कारण वह अत्यन्त दुःखसे आतुर होकर विलाप करने लगी; वह विलाप सुनिये’ ॥ २० ॥
भद्रोवाच
नारी परमधर्मज्ञ सर्वा भर्तृविनाकृता । पतिं विना जीवति या न सा जीवति दुःखिता ॥ २१ ॥ **भद्रा बोली—**परमधर्मज्ञ महाराज! जो कोई भी विधवा स्त्री पतिके बिना जीवन धारण करती है, वह निरन्तर दुःखमें डूबी रहनेके कारण वास्तवमें जीती नहीं, अपितु मृततुल्या है ॥ २१ ॥ पतिं विना मृतं श्रेयो नार्याः क्षत्रियपुङ्गव । त्वद्गतिं गन्तुमिच्छामि प्रसीदस्व नयस्व माम् ॥ २२ ॥ त्वया हीना क्षणमपि नाहं जीवितुमुत्सहे । प्रसादं कुरु मे राजन्नितस्तूर्णं नयस्व माम् ॥ २३ ॥