महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘यह महाबली श्रेष्ठ वीर बालक समस्त क्षत्रियसमूहका नायक होगा और युद्धमें भूमिपालोंको जीतकर भाइयोंके साथ तीन अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करेगा ।। ४२ ।। जामदग्न्यसमः कुन्ति विष्णुतुल्यपराक्रमः । एष वीर्यवतां श्रेष्ठो भविष्यति महायशाः ।। ४३ ।। ‘कुन्ती! यह परशुरामके समान वीर योद्धा, भगवान् विष्णुके समान पराक्रमी, बलवानोंमें श्रेष्ठ और महान् यशस्वी होगा ।। ४३ ।। एष युद्धे महादेवं तोषयिष्यति शंकरम् । अस्त्रं पाशुपतं नाम तस्मात् तुष्टादवाप्स्यति ।। ४४ ।। निवातकवचा नाम दैत्या विबुधविद्विषः । शक्राज्ञया महाबाहुस्तान् वधिष्यति ते सुतः ।। ४५ ।। ‘यह युद्धमें देवाधिदेव भगवान् शंकरको संतुष्ट करेगा और संतुष्ट हुए उन महेश्वरसे पाशुपत नामक अस्त्र प्राप्त करेगा। निवातकवच नामक दैत्य देवताओंसे सदा द्वेष रखते हैं। तुम्हारा यह महाबाहु पुत्र इन्द्रकी आज्ञासे उन सब दैत्योंका संहार कर डालेगा ।। ४४-४५ ।। तथा दिव्यानि चास्त्राणि निखिलेनाहरिष्यति । विप्रणष्टां श्रियं चायमाहर्ता पुरुषर्षभः ।। ४६ ।। ‘तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ यह अर्जुन सम्पूर्ण दिव्यास्त्रोंका पूर्ण रूपसे ज्ञान प्राप्त करेगा और अपनी खोयी हुई सम्पत्तिको पुनः वापस ले आयेगा’ ।। ४६ ।। एतामत्यद्भुतां वाचं कुन्ती शुश्राव सूतके । वाचमुच्चारितामुच्चैस्तां निशम्य तपस्विनाम् ।। ४७ ।। बभूव परमो हर्षः शतशृङ्गनिवासिनाम् । तथा देवनिकायानां सेन्द्राणां च दिवौकसाम् ।। ४८ ।। कुन्तीने सौरीमेंसे ही यह अत्यन्त अद्भुत बात सुनी। उच्चस्वरमें उच्चारित वह आकाशवाणी सुनकर शतशृंगनिवासी तपस्वी मुनियों तथा विमानोंपर स्थित इन्द्र आदि देवसमूहोंको बड़ा हर्ष हुआ ।। ४७-४८ ।। आकाशे दुन्दुभीनां च बभूव तुमुलः स्वनः । उदतिष्ठन्महाघोषः पुष्पवृष्टिभिरावृतः ।। ४९ ।। तदनन्तर आकाशमें फूलोंकी वर्षाके साथ देव-दुन्दुभियोंका तुमुल नाद बड़े जोरसे गूँज उठा ।। ४९ ।। समवेत्य च देवानां गणाः पार्थमपूजयन् । काद्रवेया वैनतेया गन्धर्वाप्सरसस्तथा । प्रजानां पतयः सर्वे सप्त चैव महर्षयः ।। ५० ।। भरद्वाजः कश्यपो गौतमश्च विश्वामित्रो जमदग्निर्वसिष्ठः ।