भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 883

यश्चोदितो भास्करेऽभूत् प्रणष्टे सोऽप्यत्रात्रिर्भगवान्याजगाम ॥ ५१ ॥

फिर झुंड-के-झुंड देवता वहाँ एकत्र होकर अर्जुनकी प्रशंसा करने लगे। कद्रूके पुत्र (नाग), विनताके पुत्र (गरुड पक्षी), गन्धर्व, अप्सराएँ, प्रजापति, सप्तर्षिगण—भरद्वाज, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि, वसिष्ठ तथा जो नक्षत्रके रूपमें सूर्यास्त होनेके पश्चात् उदित होते हैं, वे भगवान् अत्रि भी वहाँ आये ॥ ५०-५१ ॥

मरीचिरङ्गिराश्चैव पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । दक्षः प्रजापतिश्चैव गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ ५२ ॥

मरीचि और अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु एवं प्रजापति दक्ष, गन्धर्व तथा अप्सराएँ भी आयीं ॥ ५२ ॥

दिव्यमाल्याम्बरधराः सर्वालंकारभूषिताः । उपगायन्ति बीभत्सुं नृत्यन्तेऽप्सरसां गणाः ॥ ५३ ॥

उन सबने दिव्य हार और दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे। वे सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थे। अप्सराओंका पूरा दल वहाँ जुट गया था। वे सभी अर्जुनके गुण गाने और नृत्य करने लगीं ॥ ५३ ॥

तथा महर्षयश्चापि जेपुस्तत्र समन्ततः । गन्धर्वैः सहितः श्रीमान् प्रागायत च तुम्बुरुः ॥ ५४ ॥

महर्षि भी वहाँ सब ओर खड़े होकर मांगलिक मन्त्रोंका जप करने लगे। गन्धर्वोंके साथ श्रीमान् तुम्बुरुने मधुर स्वरसे गीत गाना प्रारम्भ किया ॥ ५४ ॥

भीमसेनोग्रसेनौ च ऊर्णायुरनघस्तथा । गोपतिर्धृतराष्ट्रश्च सूर्यवर्चास्तथाष्टमः ॥ ५५ ॥ युगपस्तृणपः कार्ष्णिर्नन्दिश्चित्ररथस्तथा । त्रयोदशः शालिशिराः पर्जन्यश्च चतुर्दशः ॥ ५६ ॥ कलिः पञ्चदशश्चैव नारदश्चात्र षोडशः । ऋत्वा बृहत्त्वा बृहकः करालश्च महामनाः ॥ ५७ ॥ ब्रह्मचारी बहुगुणः सुवर्णश्चेति विश्रुतः । विश्वावसुर्भमन्युश्च सुचन्द्रश्च शरुस्तथा ॥ ५८ ॥ गीतमाधुर्यसम्पन्नौ विख्यातौ च हाहाहूहू । इत्येते देवगन्धर्वा जग्मुस्तत्र नराधिप ॥ ५९ ॥

भीमसेन तथा उग्रसेन, ऊर्णायु और अनघ, गोपति एवं धृतराष्ट्र, सूर्यवर्चा तथा आठवें युगप, तृणप, कार्ष्णि, नन्दि एवं चित्ररथ, तेरहवें शालिशिरा और चौदहवें पर्जन्य, पंद्रहवें कलि और सोलहवें नारद, ऋत्वा और बृहत्त्वा, बृहक एवं महामना कराल, ब्रह्मचारी तथा