भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 896

प्रहृष्टमनसं तत्र विचरन्तं यथामरम् । तं माद्र्यनुजगामैका वसनं बिभ्रती शुभम् ॥ ५ ॥ वे मनमें हर्षोल्लास भरकर देवताकी भाँति वहाँ विचर रहे थे। उस समय माद्री सुन्दर वस्त्र पहने अकेली उनके पीछे-पीछे जा रही थी ॥ ५ ॥ समीक्षमाणः स तु तां वयःस्थां तनुवाससम् । तस्य कामः प्रववृधे गहनेऽग्निरिवोद्गतः ॥ ६ ॥ वह युवावस्थासे युक्त थी और उसके शरीरपर झीनी-झीनी साड़ी सुशोभित थी। उसकी ओर देखते ही पाण्डुके मनमें कामनाकी आग जल उठी, मानो घने वनमें दावाग्नि प्रज्वलित हो उठी हो ॥ ६ ॥ रहस्येकां तु तां दृष्ट्वा राजा राजीवलोचनाम् । न शशाक नियन्तुं तं कामं कामवशीकृतः ॥ ७ ॥ एकान्त प्रदेशमें कमलनयनी माद्रीको अकेली देखकर राजा कामका वेग रोक न सके, वे पूर्णतः कामदेवके अधीन हो गये थे ॥ ७ ॥ तत एनां बलाद् राजा निजग्राह रहो गताम् । वार्यमाणस्तया देव्या विस्फुरन्त्या यथाबलम् ॥ ८ ॥ अतः एकान्तमें मिली हुई माद्रीको महाराज पाण्डुने बलपूर्वक पकड़ लिया। देवी माद्री राजाकी पकड़से छूटनेके लिये यथाशक्ति चेष्टा करती हुई उन्हें बार-बार रोक रही थी ॥ ८ ॥ स तु कामपरीतात्मा तं शापं नान्वबुध्यत । माद्रीं मैथुनधर्मेण सोऽन्वगच्छद् बलादिव ॥ ९ ॥ जीवितान्ताय कौरव्य मन्मथस्य वशं गतः । शापजं भयमुत्सृज्य विधिना सम्प्रचोदितः ॥ १० ॥ परंतु उनके मनपर तो कामका वेग सवार था; अतः उन्होंने मृगरूपधारी मुनिसे प्राप्त हुए शापका विचार नहीं किया। कुरुनन्दन जनमेजय! वे कामके वशमें हो गये थे, इसलिये प्रारब्धसे प्रेरित हो शापके भयकी अवहेलना करके स्वयं ही अपने जीवनका अन्त करनेके लिये बलपूर्वक मैथुन करनेकी इच्छा रखकर माद्रीसे लिपट गये ॥ ९-१० ॥ तस्य कामात्मनो बुद्धिः साक्षात् कालेन मोहिता । सम्प्रमथ्येन्द्रियग्रामं प्रणष्टा सह चेतसा ॥ ११ ॥ साक्षात् कालने कामात्मा पाण्डुकी बुद्धि मोह ली थी। उनकी बुद्धि सम्पूर्ण इन्द्रियोंको मथकर विचार-शक्तिके साथ-साथ स्वयं भी नष्ट हो गयी थी ॥ ११ ॥ स तया सह संगम्य भार्यया कुरुनन्दनः । पाण्डुः परमधर्मात्मा युयुजे कालधर्मणा ॥ १२ ॥