महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 897, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुरुकुलको आनन्दित करनेवाले परम धर्मात्मा महाराज पाण्डु इस प्रकार अपनी धर्मपत्नी माद्रीसे समागम करके कालके गालमें पड़ गये ॥ १२ ॥
ततो माद्री समालिङ्ग्य राजानं गतचेतसम् । मुमोच दुःखजं शब्दं पुनः पुनरतीव हि ॥ १३ ॥ तब माद्री राजाके शवसे लिपटकर बार-बार अत्यन्त दुःखभरी वाणीमें विलाप करने लगी ॥ १३ ॥
सह पुत्रैस्ततः कुन्ती माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । आजग्मुः सहितास्तत्र यत्र राजा तथागतः ॥ १४ ॥ इतनेमें ही पुत्रोंसहित कुन्ती और दोनों पाण्डुनन्दन माद्रीकुमार एक साथ उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ राजा पाण्डु मृतकावस्थामें पड़े थे ॥ १४ ॥
ततो माद्र्यब्रवीद् राजन्नार्ता कुन्तीमिदं वचः । एकैव त्वमिहागच्छ तिष्ठन्त्वत्रैव दारकाः ॥ १५ ॥ जनमेजय! यह देख शोकातुर माद्रीने कुन्तीसे कहा—'बहिन! आप अकेली ही यहाँ आयें। बच्चोंको वहीं रहने दें' ॥ १५ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्यास्तत्रैवाधाय दारकान् । हताहमिति विक्रुश्य सहसैवाजगाम सा ॥ १६ ॥ माद्रीका यह वचन सुनकर कुन्तीने सब बालकोंको वहीं रोक दिया और 'हाय! मैं मारी गयी' इस प्रकार आर्तनाद करती हुई सहसा माद्रीके पास आ पहुँची ॥ १६ ॥
दृष्ट्वा पाण्डुं च माद्रीं च शयानौ धरणीतले । कुन्ती शोकपरीताङ्गी विललाप सुदुःखिता ॥ १७ ॥ आकर उसने देखा, पाण्डु और माद्री धरतीपर पड़े हुए हैं। यह देख कुन्तीके सम्पूर्ण शरीरमें शोकाग्नि व्याप्त हो गयी और वह अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगी — ॥ १७ ॥
रक्ष्यमाणो मया नित्यं वीरः सततमात्मवान् । कथं त्वामत्यतिक्रान्तः शापं जानन् वनौकसः ॥ १८ ॥ 'माद्री! मैं सदा वीर एवं जितेन्द्रिय महाराजकी रक्षा करती आ रही थी। उन्होंने मृगके शापकी बात जानते हुए भी तुम्हारे साथ बलपूर्वक समागम कैसे किया? ॥ १८ ॥
ननु नाम त्वया माद्रि रक्षितव्यो नराधिपः । सा कथं लोभितवती विजने त्वं नराधिपम् ॥ १९ ॥ 'माद्री! तुम्हें तो महाराजकी रक्षा करनी चाहिये थी। तुमने एकान्तमें उन्हें लुभाया क्यों? ॥ १९ ॥
कथं दीनस्य सततं त्वामासाद्य रहोगताम् । तं विचिन्तयतः शापं प्रहर्षः समजायत ॥ २० ॥