भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 919, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 919

बहुमायासमाकीर्णो नानादोषसमाकुलः । लुप्तधर्मक्रियाचारो घोरः कालो भविष्यति ॥ ७ ॥ ‘अब ऐसा भयंकर समय आयेगा, जिसमें सब ओर छल-कपट और मायाका बोलबाला होगा। संसारमें अनेक प्रकारके दोष प्रकट होंगे और धर्म-कर्म तथा सदाचारका लोप हो जायगा’ ॥ ७ ॥

कुरूणामनयाच्चापि पृथिवी न भविष्यति । गच्छ त्वं योगमास्थाय युक्ता वस तपोवने ॥ ८ ॥ ‘दुर्योधन आदि कौरवोंके अन्यायसे सारी पृथ्वी वीरोंसे शून्य हो जायगी; अतः तुम योगका आश्रय लेकर यहाँसे चली जाओ और योगपरायण हो तपोवनमें निवास करो ॥ ८ ॥

मा द्राक्षीस्त्वं कुलस्यास्य घोरं संक्षयमात्मनः । तथेति समनुज्ञाय सा प्रविश्याब्रवीत् स्नुषाम् ॥ ९ ॥ ‘तुम अपनी आँखोंसे इस कुलका भयंकर संहार न देखो।’ तब व्यासजीसे ‘तथास्तु’ कहकर सत्यवती अंदर गयी और अपनी पुत्रवधूसे बोली— ॥ ९ ॥

अम्बिके तव पौत्रस्य दुर्नयात् किल भारताः । सानुबन्धा विनङ्क्ष्यन्ति पौराश्चैवेति नः श्रुतम् ॥ १० ॥ ‘अम्बिके! तुम्हारे पौत्रके अन्यायसे भरतवंशी वीर तथा इस नगरके लोग सगे-सम्बन्धियोंसहित नष्ट हो जायँगे—ऐसी बात मैंने सुनी है ॥ १० ॥

तत् कौसल्यामिमामार्तां पुत्रशोकाभिपीडिताम् । वनमादाय भद्रं ते गच्छामि यदि मन्यसे ॥ ११ ॥ ‘अतः तुम्हारी राय हो, तो पुत्रशोकसे पीड़ित इस दुःखिनी अम्बालिकाको साथ ले मैं वनमें चली जाऊँ। तुम्हारा कल्याण हो’ ॥ ११ ॥

तथेत्युक्ता त्वम्बिकया भीष्ममामन्त्र्य सुव्रता । वनं ययौ सत्यवती स्नुषाभ्यां सह भारत ॥ १२ ॥ अम्बिका भी ‘तथास्तु’ कहकर साथ जानेको तैयार हो गयी। जनमेजय! फिर उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सत्यवती भीष्मजीसे पूछकर अपनी दोनों पतोहुओंको साथ ले वनको चली गयी ॥ १२ ॥

ताः सुघोरं तपस्तप्त्वा देव्यो भरतसत्तम । देहं त्यक्त्वा महाराज गतिमिष्टां ययुस्तदा ॥ १३ ॥ भरतवंशशिरोमणि महाराज जनमेजय! तब वे देवियाँ वनमें अत्यन्त घोर तपस्या करके शरीर त्यागकर अभीष्ट गतिको प्राप्त हो गयीं ॥ १३ ॥

वैशम्पायन उवाच

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व · पृष्ठ 919, कुल 2256 में से · BharatKosha