महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 920, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथाप्तवन्तो वेदोक्तान् संस्कारान् पाण्डवास्तदा । संव्यवर्धन्त भोगांस्ते भुञ्जानाः पितृवेश्मनि ॥ १४ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! उस समय पाण्डवोंके वेदोक्त (समावर्तन आदि) संस्कार हुए। वे पिताके घरमें नाना प्रकारके भोग भोगते हुए पलने और पुष्ट होने लगे ॥ १४ ॥
धार्तराष्ट्रैश्च सहिताः क्रीडन्तो मुदिताः सुखम् । बालक्रीडासु सर्वासु विशिष्टास्तेजसाभवन् ॥ १५ ॥ धृतराष्ट्रके पुत्रोंके साथ सुखपूर्वक खेलते हुए वे सदा प्रसन्न रहते थे। सब प्रकारकी बालक्रीड़ाओंमें अपने तेजसे वे बढ़-चढ़कर सिद्ध होते थे ॥ १५ ॥
जवे लक्ष्याभिहरणे भोज्ये पांसुविकर्षणे । धार्तराष्ट्रान् भीमसेनः सर्वान् स परिमर्दति ॥ १६ ॥ दौड़नेमें, दूर रखी हुई किसी प्रत्यक्ष वस्तुको सबसे पहले पहुँचकर उठा लेनेमें, खान-पानमें तथा धूल उछालनेके खेलमें भीमसेन धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंका मानमर्दन कर डालते थे ॥ १६ ॥
हर्षात् प्रक्रीडमानांस्तान् गृह्य राजन् निलीयते । शिरःसु विनिगृह्यैतान् योधयामास पाण्डवैः ॥ १७ ॥ शतमेकोत्तरं तेषां कुमाराणां महौजसाम् । एक एव निगृह्णाति नातिकृच्छ्राद् वृकोदरः ॥ १८ ॥ कचेषु च निगृह्यैनान् विनिहत्य बलाद् बली । चकर्ष क्रोशतो भूमौ घृष्टजानुशिरोंऽसकान् ॥ १९ ॥ राजन्! हर्षसे खेल-कूदमें लगे हुए उन कौरवोंको पकड़कर भीमसेन कहीं छिप जाते थे। कभी उनके सिर पकड़कर पाण्डवोंसे लड़ा देते थे। धृतराष्ट्रके एक सौ एक कुमार बड़े बलवान् थे; किंतु भीमसेन बिना अधिक कष्ट उठाये अकेले ही उन सबको अपने वशमें कर लेते थे। बलवान् भीम उनके बाल पकड़कर बलपूर्वक उन्हें एक-दूसरेसे टकरा देते और उनके चीखने-चिल्लानेपर भी उन्हें धरतीपर घसीटते रहते थे। उस समय उनके घुटने, मस्तक और कंधे छिल जाया करते थे ॥ १७—१९ ॥
दश बालाञ्जले क्रीडन् भुजाभ्यां परिगृह्य सः । आस्ते स्म सलिले मग्नो मृतकल्पान् विमुञ्चति ॥ २० ॥ वे जलमें क्रीड़ा करते समय अपनी दोनों भुजाओंसे धृतराष्ट्रके दस बालकोंको पकड़ लेते और देरतक पानीमें गोते लगाते रहते थे। जब वे अधमरे-से हो जाते, तब उन्हें छोड़ते थे ॥ २० ॥
फलानि वृक्षमारुह्य विचिन्वन्ति च ते तदा । तदा पादप्रहारेण भीमः कम्पयते द्रुमान् ॥ २१ ॥