महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रसह्य बन्धने बद्ध्वा प्रशासिष्ये वसुंधराम् । एवं स निश्चयं पापः कृत्वा दुर्योधनस्तदा । नित्यमेवान्तरप्रेक्षी भीमस्यासीन्महात्मनः ॥ ३० ॥ 'इसलिये नगरोद्यानमें जब वह सो जाय, तब उसे उठाकर हमलोग गंगाजीमें फेंक दें। इसके बाद उसके छोटे भाई अर्जुन और बड़े भाई युधिष्ठिरको बलपूर्वक कैदमें डालकर मैं अकेला ही सारी पृथ्वीका शासन करूँगा।' ऐसा निश्चय करके पापी दुर्योधन महात्मा भीमसेनका अनिष्ट करनेके लिये सदा मौका ढूँढ़ता रहता था ॥ २९-३० ॥
ततो जलविहारार्थं कारयामास भारत । चैलकम्बलवेश्मानि विचित्राणि महान्ति च ॥ ३१ ॥ जनमेजय! तदनन्तर दुर्योधनने गंगातटपर जल-विहारके लिये ऊनी और सूती कपड़ोंके विचित्र एवं विशाल गृह तैयार कराये ॥ ३१ ॥
सर्वकामैः सुपूर्णानि पताकोच्छ्रायवन्ति च । तत्र संजनयामास नानागारण्यनेकशः ॥ ३२ ॥ वे गृह सब प्रकारकी अभीष्ट सामग्रियोंसे भरे-पूरे थे। उनके ऊपर ऊँची-ऊँची पताकाएँ फहरा रही थीं। उनमें उसने अलग-अलग अनेक प्रकारके बहुत-से कमरे बनवाये थे ॥ ३२ ॥
उदकक्रीडनं नाम कारयामास भारत । प्रमाणकोट्यां तं देशं स्थलं किंचिदुपेत्य ह ॥ ३३ ॥ भारत! गंगातटवर्ती प्रमाणकोटि तीर्थमें किसी स्थानपर जाकर दुर्योधनने यह सारा आयोजन करवाया था। उसने उस स्थानका नाम रखा था उदकक्रीडन ॥ ३३ ॥
भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च चोष्यं लेह्यमथापि च । उपपादितं नरैस्तत्र कुशलैः सूदकर्मणि ॥ ३४ ॥ वहाँ रसोईके काममें कुशल कितने ही मनुष्योंने जुटकर खाने-पीनेके बहुत-से भक्ष्य³, भोज्य³, पेय³, चोष्य⁴ और लेह्य⁵ पदार्थ तैयार किये ॥ ३४ ॥
न्यवेदयंस्तत् पुरुषा धार्तराष्ट्राय वै तदा । ततो दुर्योधनस्तत्र पाण्डवानाह दुर्मतिः ॥ ३५ ॥ तदनन्तर राजपुरुषोंने दुर्योधनको सूचना दी कि 'सब तैयारी पूरी हो गयी है।' तब खोटी बुद्धिवाले दुर्योधनने पाण्डवोंसे कहा— ॥ ३५ ॥
गङ्गां चैवानुयास्याम उद्यानवनशोभिताम् । सहिता भ्रातरः सर्वे जलक्रीडामवाप्नुमः ॥ ३६ ॥