महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘आज हमलोग भाँति-भाँतिके उद्यान और वनोंसे सुशोभित गंगाजीके तटपर चलें। वहाँ हम सब भाई एक साथ जलविहार करेंगे’ ।। ३६ ।। एवमस्त्विति तं चापि प्रत्युवाच युधिष्ठिरः । ते रथैर्नगराकारैर्देशजैश्च गजोत्तमैः ।। ३७ ।। निर्ययुर्नगराच्छूराः कौरवाः पाण्डवैः सह । उद्यानवनमासाद्य विसृज्य च महाजनम् ।। ३८ ।। विशन्ति स्म तदा वीराः सिंहा इव गिरेर्गुहाम् । उद्यानमभिपश्यन्तो भ्रातरः सर्व एव ते ।। ३९ ।। यह सुनकर युधिष्ठिरने ‘एवमस्तु’ कहकर दुर्योधनकी बात मान ली। फिर वे सभी शूरवीर कौरव पाण्डवोंके साथ नगराकार रथों तथा स्वदेशमें उत्पन्न श्रेष्ठ हाथियोंपर सवार हो नगरसे निकले और उद्यान-वनके समीप पहुँचकर साथ आये हुए प्रजावर्गके बड़े-बड़े लोगोंको विदा करके जैसे सिंह पर्वतकी गुफामें प्रवेश करे, उसी प्रकार वे सब वीर भ्राता उद्यानकी शोभा देखते हुए उसमें प्रविष्ट हुए ।। ३७—३९ ।। उपस्थानगृहैः शुभ्रैर्वलभीभिश्च शोभितम् । गवाक्षकैस्तथा जालैर्यन्त्रैः सांचारिकैरपि ।। ४० ।। सम्मार्जितं सौधकारैश्चित्रकारैश्च चित्रितम् । दीर्घिकाभिश्च पूर्णाभिस्तथा पद्माकरैरपि ।। ४१ ।। जलं तच्छुशुभे छन्नं फुल्लैर्जलरुहैस्तथा । उपच्छन्ना वसुमती तथा पुष्पैर्यथर्तुकैः ।। ४२ ।। वह उद्यान राजाओंकी गोष्ठी और बैठकके स्थानोंसे, श्वेत वर्णके छज्जोंसे, जालियों और झरोखोंसे तथा इधर-उधर ले जानेयोग्य जलवर्षक यन्त्रोंसे सुशोभित हो रहा था। महल बनानेवाले शिल्पियोंने उस उद्यान एवं क्रीड़ाभवनको झाड़-पोंछकर साफ कर दिया था। चित्रकारोंने वहाँ चित्रकारी की थी। जलसे भरी बावलियों तथा तालाबोंद्वारा उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। खिले हुए कमलोंसे आच्छादित वहाँका जल बड़ा सुन्दर प्रतीत होता था। ऋतुके अनुकूल खिलकर झड़े हुए फूलोंसे वहाँकी सारी पृथ्वी ढँक गयी थी ।। ४०—४२ ।। तत्रोपविष्टास्ते सर्वे पाण्डवाः कौरवाश्च ह । उपपन्नान् बहून् कामांस्ते भुञ्जन्ति ततस्ततः ।। ४३ ।। वहाँ पहुँचकर समस्त कौरव और पाण्डव यथायोग्य स्थानोंपर बैठ गये और स्वतः प्राप्त हुए नाना प्रकारके भोगोंका उपभोग करने लगे ।। ४३ ।। अथोद्यानवरे तस्मिंस्तथा क्रीडागताश्च ते । परस्परस्य वक्त्रेभ्यो ददुर्भक्ष्यांस्ततस्ततः ।। ४४ ।। ततो दुर्योधनः पापस्तद्भक्ष्ये कालकूटकम् । विषं प्रक्षेपयामास भीमसेनजिघांसया ।। ४५ ।।