महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर उस सुन्दर उद्यानमें क्रीड़ाके लिये आये हुए कौरव और पाण्डव एक-दूसरेके मुँहमें खानेकी वस्तुएँ डालने लगे। उस समय पापी दुर्योधनने भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे उनके भोजनमें कालकूट नामक विष डलवा दिया ।। ४४-४५ ।।
स्वयमुत्थाय चैवाथ हृदयेन क्षुरोपमः ।
स वाचामृतकल्पश्च भ्रातृवच्च सुहृद् यथा ।। ४६ ।।
स्वयं प्रक्षिपते भक्ष्यं बहु भीमस्य पापकृत् ।
प्रतीच्छितं स्म भीमेन तं वै दोषमजानता ।। ४७ ।।
ततो दुर्योधनस्तत्र हृदयेन हसन्निव ।
कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यते पुरुषाधमः ।। ४८ ।।
उस पापात्माका हृदय छूरेके समान तीखा था; परंतु बातें वह ऐसी करता था, मानो उनसे अमृत झर रहा हो। वह सगे भाई और हितैषी सुहृद्की भाँति स्वयं भीमसेनके लिये भाँति-भाँतिके भक्ष्य पदार्थ परोसने लगा। भीमसेन भोजनके दोषसे अपरिचित थे; अतः दुर्योधनने जितना परोसा, वह सब-का-सब खा गये। यह देख नीच दुर्योधन मन-ही-मन हँसता हुआ-सा अपने-आपको कृतार्थ मानने लगा ।। ४६—४८ ।।
ततस्ते सहिताः सर्वे जलक्रीडामकुर्वत ।
पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च तदा मुदितमानसाः ।। ४९ ।।
तब भोजनके पश्चात् पाण्डव तथा धृतराष्ट्रके पुत्र सभी प्रसन्नचित्त हो एक साथ जलक्रीड़ा करने लगे ।। ४९ ।।