भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 925

क्रीडावसाने ते सर्वे शुचिवस्त्राः स्वलंकृताः ।
दिवसान्ते परिश्रान्ता विहृत्य च कुरूद्वहाः ॥ ५० ॥
विहारावसथेष्वेव वीरा वासमरोचयन् ।
खिन्नस्तु बलवान् भीमो व्यायम्याभ्यधिकं तदा ॥ ५१ ॥
जलक्रीड़ा समाप्त होनेपर दिनके अन्तमें विहारसे थके हुए वे समस्त कुरुश्रेष्ठ वीर शुद्ध वस्त्र धारणकर सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित हो उन क्रीड़ाभवनोंमें ही रात बितानेका विचार करने लगे। बलवान् भीमसेन उस समय अधिक परिश्रम करनेके कारण बहुत थक गये थे ॥ ५०-५१ ॥
वाहयित्वा कुमारांस्ताञ्जलक्रीडागतांस्तदा ।
प्रमाणकोट्यां वासार्थी सुष्वापावाप्य तत् स्थलम् ॥ ५२ ॥
वे जलक्रीड़ाके लिये आये हुए उन कुमारोंको साथ लेकर विश्राम करनेकी इच्छासे प्रमाणकोटिके उस गृहमें आये और वहीं एक स्थानमें सो गये ॥ ५२ ॥
शीतं वातं समासाद्य श्रान्तो मदविमोहितः ।
विषेण च परीताङ्गो निश्चेष्टः पाण्डुनन्दनः ॥ ५३ ॥
पाण्डुनन्दन भीम थके तो थे ही, विषके मदसे भी अचेत हो रहे थे। उनके अंग-अंगमें विषका प्रभाव फैल गया था। अतः वहाँ ठंडी हवा पाकर ऐसे सोये कि जडके समान निश्चेष्ट