महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 933, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतैश्चापि सम्परिष्वक्तः सह मात्रा नरर्षभैः । अन्योन्यगतसौहार्दाद् दिष्ट्या दिष्ट्येति चाब्रुवन् ॥ ३१ ॥ माता तथा उन नरश्रेष्ठ भाइयों ने भी उन्हें हृदयसे लगाया और एक-दूसरेके प्रति स्नेहाधिक्यके कारण सबने भीमके आगमनसे अपने सौभाग्यकी सराहना की—‘अहोभाग्य! अहोभाग्य!’ कहा ॥ ३१ ॥
ततस्तत् सर्वमाचष्ट दुर्योधनविचेष्टितम् । भ्रातॄणां भीमसेनश्च महाबलपराक्रमः ॥ ३२ ॥ तदनन्तर महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न भीमसेनने दुर्योधनकी वे सारी कुचेष्टाएँ अपने भाइयोंको बतायीं ॥ ३२ ॥
नागलोके च यद् वृत्तं गुणदोषमशेषतः । तच्च सर्वमशेषेण कथयामास पाण्डवः ॥ ३३ ॥ और नागलोकमें जो गुण-दोषपूर्ण घटनाएँ घटी थीं, उन सबको भी पाण्डुनन्दन भीमने पूर्णरूपसे कह सुनाया ॥ ३३ ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा भीममाह वचोऽर्थवत् । तूष्णीं भव न ते जल्प्यमिदं कार्यं कथंचन ॥ ३४ ॥ तब राजा युधिष्ठिरने भीमसेनसे मतलबकी बात कही—‘भैया भीम! तुम सर्वथा चुप हो जाओ। तुम्हारे साथ जो बर्ताव किया गया है, वह कहीं किसी प्रकार भी न कहना’ ॥ ३४ ॥
एवमुक्त्वा महाबाहुर्धर्मराजो युधिष्ठिरः । भ्रातृभिः सहितः सर्वैरप्रमत्तोऽभवत् तदा ॥ ३५ ॥ यों कहकर महाबाहु धर्मराज युधिष्ठिर अपने सब भाइयोंके साथ उस समयसे खूब सावधान रहने लगे ॥ ३५ ॥
सारथिं चास्य दयितमपहस्तेन जघ्निवान् । धर्मात्मा विदुरस्तेषां पार्थानां प्रददौ मतिम् ॥ ३६ ॥ दुर्योधनने भीमसेनके प्रिय सारथिको हाथसे गला घोंटकर मार डाला। उस समय भी धर्मात्मा विदुरने उन कुन्तीपुत्रोंको यही सलाह दी कि वे चुपचाप सब कुछ सहन कर लें ॥ ३६ ॥
भोजने भीमसेनस्य पुनः प्राक्षेपयद् विषम् । कालकूटं नवं तीक्ष्णं सम्भृतं लोमहर्षणम् ॥ ३७ ॥ धृतराष्ट्रकुमारने भीमसेनके भोजनमें पुनः नया, तीखा और सत्त्वके रूपमें परिणत रोंगटे खड़े कर देनेवाला कालकूट नामक विष डलवा दिया ॥ ३७ ॥
वैश्यापुत्रस्तदाचष्ट पार्थानां हितकाम्यया । तच्चापि भुक्त्वाजरयदविकारं वृकोदरः ॥ ३८ ॥