महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैश्यापुत्र युयुत्सुने कुन्तीपुत्रोंके हितकी कामनासे यह बात उन्हें बता दी। परंतु भीमने उस विषको भी खाकर बिना किसी विकारके पचा लिया॥ ३८॥
विकारं न ह्यजनयत् सुतीक्ष्णमपि तद् विषम्।
भीमसंहनने भीमे अजीर्यत वृकोदरे॥ ३९॥
यद्यपि वह विष बड़ा तेज था, तो भी उनके लिये कोई बिगाड़ न कर सका। भयंकर शरीरवाले भीमसेनके उदरमें वृक नामकी अग्नि थी; अतः वहाँ जाकर वह विष पच गया॥ ३९॥
एवं दुर्योधनः कर्णः शकुनिश्चापि सौबलः।
अनेकैरभ्युपायैस्ताञ्जिघांसन्ति स्म पाण्डवान्॥ ४०॥
इस प्रकार दुर्योधन, कर्ण तथा सुबलपुत्र शकुनि अनेक उपायोंद्वारा पाण्डवोंको मार डालना चाहते थे॥ ४०॥
पाण्डवाश्चापि तत् सर्वं प्रत्यजानन्नमर्षिताः।
उद्भावनमकुर्वन्तो विदुरस्य मते स्थिताः॥ ४१॥
पाण्डव भी यह सब जान लेते और क्रोधमें भर जाते थे, तो भी विदुरकी रायके अनुसार चलनेके कारण अपने अमर्षको प्रकट नहीं करते थे॥ ४१॥
कुमारान् क्रीडमानांस्तान् दृष्ट्वा राजातिदुर्मदान्।
गुरुं शिक्षार्थमन्विष्य गौतमं तान् न्यवेदयत्॥ ४२॥
शरस्तम्बे समुद्भूतं वेदशास्त्रार्थपारगम्।
अधिजग्मुश्च कुरवो धनुर्वेदं कृपात् तु ते॥ ४३॥
राजा धृतराष्ट्रने उन कुमारोंको खेल-कूदमें लगे रहनेसे अत्यन्त उद्दण्ड होते देख उन्हें शिक्षा देनेके लिये गौतम-गोत्रीय कृपाचार्यकी खोज करायी, जो सरकंडेके समूहसे उत्पन्न हुए और विविध शास्त्रोंके पारंगत विद्वान् थे। उन्हींको गुरु बनाकर कुरुकुलके उन सभी कुमारोंको उन्हें सौंप दिया गया; फिर वे कुरुवंशी बालक कृपाचार्यसे धनुर्वेदका अध्ययन करने लगे॥ ४२-४३॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीमप्रत्यागमने
अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीमसेनके लौटनेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२८॥