भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 941

पुत्र उत्पन्न करनेकी प्रेरणा दी; अतः द्रोणाचार्यने पुत्रके लोभसे शरद्वान्‌की पुत्री कृपीको धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण किया। कृपी सदा अग्निहोत्र, धर्मानुष्ठान तथा इन्द्रियसंयममें उनका साथ देती थी ॥ ४५-४६ ॥ अलभद् गौतमी पुत्रमश्वत्थामानमेव च । स जातमात्रो व्यनदद् यथैवोच्चैःश्रवा हयः ॥ ४७ ॥ गौतमी कृपीने द्रोणसे अश्वत्थामा नामक पुत्र प्राप्त किया। उस बालकने जन्म लेते ही उच्चैःश्रवा घोड़ेके समान शब्द किया ॥ ४७ ॥ तच्छ्रुत्वान्तर्हितं भूतमन्तरिक्षस्थमब्रवीत् । अश्वस्येवास्य यत् स्थाम नदतः प्रदिशो गतम् ॥ ४८ ॥ अश्वत्थामैव बालोऽयं तस्मान्नाम्ना भविष्यति । सुतेन तेन सुप्रीतो भारद्वाजस्ततोऽभवत् ॥ ४९ ॥ उसे सुनकर अन्तरिक्षमें स्थित किसी अदृश्य चेतनने कहा—'इस बालकके चिल्लाते समय अश्वके समान शब्द सम्पूर्ण दिशाओंमें गूँज उठा है; अतः यह अश्वत्थामा नामसे ही प्रसिद्ध होगा।' उस पुत्रसे भरद्वाजनन्दन द्रोणको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४८-४९ ॥ तत्रैव च वसन् धीमान् धनुर्वेदपरोऽभवत् । स शुश्राव महात्मानं जामदग्न्यं परंतपम् ॥ ५० ॥ सर्वज्ञानविदं विप्रं सर्वशस्त्रभृतां वरम् । ब्राह्मणेभ्यस्तदा राजन् दित्सन्तं वसु सर्वशः ॥ ५१ ॥ बुद्धिमान् द्रोण उसी आश्रममें रहकर धनुर्वेदका अभ्यास करने लगे। राजन्! किसी समय उन्होंने सुना कि 'महात्मा जमदग्निनन्दन परशुरामजी इस समय सर्वज्ञ एवं सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं तथा शत्रुओंको संताप देनेवाले वे विप्रवर ब्राह्मणोंको अपना सर्वस्व दान करना चाहते हैं ॥ ५०-५१ ॥ स रामस्य धनुर्वेदं दिव्यान्यस्त्राणि चैव ह । श्रुत्वा तेषु मनश्चक्रे नीतिशास्त्रे तथैव च ॥ ५२ ॥ द्रोणने यह सुनकर कि परशुरामजीके पास सम्पूर्ण धनुर्वेद तथा दिव्यास्त्रोंका ज्ञान है, उन्हें प्राप्त करनेकी इच्छा की। इसी प्रकार उन्होंने उनसे नीति-शास्त्रकी शिक्षा लेनेका भी विचार किया ॥ ५२ ॥ ततः स व्रतिभिः शिष्यैस्तपोयुक्तैर्महातपाः । वृतः प्रायान्महाबाहुर्महेन्द्रं पर्वतोत्तमम् ॥ ५३ ॥ फिर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले तपस्वी शिष्योंसे घिरे हुए महातपस्वी महाबाहु द्रोण परम उत्तम महेन्द्र पर्वतपर गये ॥ ५३ ॥ ततो महेन्द्रमासाद्य भारद्वाजो महातपाः । क्षान्तं दान्तममित्रघ्नमपश्यद् भृगुनन्दनम् ॥ ५४ ॥