भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 942

महेन्द्र पर्वतपर पहुँचकर महान् तपस्वी द्रोणने क्षमा एवं शम-दम आदि गुणोंसे युक्त

शत्रुनाशक भृगुनन्दन परशुरामजीका दर्शन किया ।। ५४ ।।

ततो द्रोणो वृतः शिष्यैरुपगम्य भृगूद्वहम् ।

आचख्यावात्मनो नाम जन्म चाङ्गिरसः कुले ।। ५५ ।।

तत्पश्चात् शिष्योंसहित द्रोणने भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीके समीप जाकर अपना नाम बताया

और यह भी कहा कि 'मेरा जन्म आंगिरस कुलमें हुआ है' ।। ५५ ।।

निवेद्य शिरसा भूमौ पादौ चैवाभ्यवादयत् ।

ततस्तं सर्वमुत्सृज्य वनं जिगमिषुं तदा ।। ५६ ।।

जामदग्न्यं महात्मानं भारद्वाजोऽब्रवीदिदम् ।

भरद्वाजात् समुत्पन्नं तथा त्वं मामयोनिजम् ।। ५७ ।।

आगतं वित्तकामं मां विद्धि द्रोणं द्विजर्षभ ।

इस प्रकार नाम और गोत्र बताकर उन्होंने पृथ्वीपर मस्तक टेक दिया और

परशुरामजीके चरणोंमें प्रणाम किया। तदनन्तर सर्वस्व त्यागकर वनमें जानेकी इच्छा

रखनेवाले महात्मा जमदग्निकुमारसे द्रोणने इस प्रकार कहा- 'द्विजश्रेष्ठ! मैं महर्षि

भरद्वाजसे उत्पन्न उनका अयोनिज पुत्र हूँ। आपको यह ज्ञात हो कि मैं धनकी इच्छासे

आया हूँ। मेरा नाम द्रोण है' ।। ५६-५७ ½ ।।

तमब्रवीन्महात्मा स सर्वक्षत्रियमर्दनः ।। ५८ ।।

यह सुनकर समस्त क्षत्रियोंका संहार करनेवाले महात्मा परशुराम उनसे यों बोले

— ।। ५८ ।।

स्वागतं ते द्विजश्रेष्ठ यदिच्छसि वदस्व मे ।

एवमुक्तस्तु रामेण भारद्वाजोऽब्रवीद् वचः ।। ५९ ।।

रामं प्रहरतां श्रेष्ठं दित्सन्तं विविधं वसु ।

अहं धनमनन्तं हि प्रार्थये विपुलव्रत ।। ६० ।।

‘द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारा स्वागत है। तुम जो कुछ भी चाहते हो, मुझसे कहो।' उनके इस

प्रकार पूछनेपर भरद्वाजकुमार द्रोणने नाना प्रकारके धन-रत्नोंका दान करनेकी इच्छावाले,

योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामसे कहा- 'महान् व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! मैं आपसे ऐसे

धनकी याचना करता हूँ, जिसका कभी अन्त न हो' ।। ५९-६० ।।

राम उवाच

हिरण्यं मम यच्चान्यद् वसु किंचिदिह स्थितम् ।

ब्राह्मणेभ्यो मया दत्तं सर्वमेतत् तपोधन ।। ६१ ।।

तथैवेयं धरा देवी सागरान्ता सपत्तना ।

कश्यपाय मया दत्ता कृत्स्ना नगरमालिनी ।। ६२ ।।