भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 958

क्या विचार हैं, बतलाओ ।। ६ ।।

वैशम्पायन उवाच

तच्छ्रुत्वा कौरवेयास्ते तूष्णीमासन् विशाम्पते । अर्जुनस्तु ततः सर्वं प्रतिजज्ञे परंतप ।। ७ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा जनमेजय! आचार्यकी वह बात सुनकर सब कौरव चुप रह गये; परंतु अर्जुनने वह सब कार्य पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली ।। ७ ।।

ततोऽर्जुनं तदा मूर्ध्नि समाघ्राय पुनः पुनः । प्रीतिपूर्वं परिष्वज्य प्ररुरोद मुदा तदा ।। ८ ।। तब आचार्यने बारंबार अर्जुनका मस्तक सूँघा और उन्हें प्रेमपूर्वक हृदयसे लगाकर वे हर्षके आवेशमें रो पड़े ।। ८ ।।

ततो द्रोणः पाण्डुपुत्रानस्त्राणि विविधानि च । ग्राहयामास दिव्यानि मानुषाणि च वीर्यवान् ।। ९ ।। तब पराक्रमी द्रोणाचार्य पाण्डवों (तथा अन्य शिष्यों)-को नाना प्रकारके दिव्य एवं मानव अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा देने लगे ।। ९ ।।

राजपुत्रास्तथा चान्ये समेत्य भरतर्षभ । अभिजग्मुस्ततो द्रोणमस्त्रार्थे द्विजसत्तमम् ।। १० ।। भरतश्रेष्ठ! उस समय दूसरे-दूसरे राजकुमार भी अस्त्रविद्याकी शिक्षा लेनेके लिये द्विजश्रेष्ठ द्रोणके पास आने लगे ।। १० ।।

वृष्णयश्चान्धकाश्चैव नानादेश्याश्च पार्थिवाः । सूतपुत्रश्च राधेयो गुरुं द्रोणमियात् तदा ।। ११ ।। वृष्णिवंशी तथा अन्धकवंशी क्षत्रिय, नाना देशोंके राजकुमार तथा राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण—ये सभी आचार्य द्रोणके पास (अस्त्र-शिक्षा लेनेके लिये) आये ।। ११ ।।

स्पर्धमानस्तु पार्थेन सूतपुत्रोऽत्यमर्षणः । दुर्योधनं समाश्रित्य सोऽवमन्यत पाण्डवान् ।। १२ ।। सूतपुत्र कर्ण सदा अर्जुनसे लाग-डाँट रखता और अत्यन्त अमर्षमें भरकर दुर्योधनका सहारा ले पाण्डवोंका अपमान किया करता था ।। १२ ।।

अभ्ययात् स ततो द्रोणं धनुर्वेदचिकीर्षया । शिक्षाभुजबलोद्योगैस्तेषु सर्वेषु पाण्डवः । अस्त्रविद्यानुरागाच्च विशिष्टोऽभवदर्जुनः ।। १३ ।। तुल्येष्वस्त्रप्रयोगेषु लाघवे सौष्ठवेषु च । सर्वेषामेव शिष्याणां बभूवाभ्यधिकोऽर्जुनः ।। १४ ।।