भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 959

पाण्डुनन्दन अर्जुन (सदा अभ्यासमें लगे रहनेसे) धनुर्वेदकी जिज्ञासा, शिक्षा, बाहुबल और उद्योगकी दृष्टिसे उन सभी शिष्योंमें श्रेष्ठ एवं आचार्य द्रोणकी समानता करनेयोग्य हो गये। उनका अस्त्र-विद्यामें बड़ा अनुराग था, इसलिये वे तुल्य अस्त्रोंके प्रयोग, फुर्ती और सफाईमें भी सबसे बढ़-चढ़कर निकले ॥ १३-१४ ॥ ऐन्द्रिमप्रतिमं द्रोण उपदेशेष्वमन्यत । एवं सर्वकुमाराणामिष्वस्त्रं प्रत्यपादयत् ॥ १५ ॥ आचार्य द्रोण उपदेश ग्रहण करनेमें अर्जुनको अनुपम प्रतिभाशाली मानते थे। इस प्रकार आचार्य सब कुमारोंको अस्त्र-विद्याकी शिक्षा देते रहे ॥ १५ ॥ कमण्डलुं च सर्वेषां प्रायच्छच्चिरकारणात् । पुत्राय च ददौ कुम्भमविलम्बनकारणात् ॥ १६ ॥ यावत् ते नोपगच्छन्ति तावदस्मै परां क्रियाम् । द्रोण आचष्ट पुत्राय तत् कर्म जिष्णुरौहत ॥ १७ ॥ वे अन्य सब शिष्योंको तो पानी लानेके लिये कमण्डलु देते, जिससे उन्हें लौटनेमें कुछ विलम्ब हो जाय; परंतु अपने पुत्र अश्वत्थामाको बड़े मुँहका घड़ा देते, जिससे उसके लौटनेमें विलम्ब न हो (अतः अश्वत्थामा सबसे पहले पानी भरकर उनके पास लौट आता था)। जबतक दूसरे शिष्य लौट नहीं आते, तबतक वे अपने पुत्र अश्वत्थामाको अस्त्र-संचालनकी कोई उत्तम विधि बतलाते थे। अर्जुनने उनके इस कार्यको जान लिया ॥ १६-१७ ॥ ततः स वारुणास्त्रेण पूरयित्वा कमण्डलुम् । सममाचार्यपुत्रेण गुरुमभ्येति फाल्गुनः ॥ १८ ॥ आचार्यपुत्रात् तस्मात् तु विशेषोपचयेऽपृथक् । न व्यहीयत मेधावी पार्थोऽप्यस्त्रविदां वरः ॥ १९ ॥ अर्जुनः परमं यत्नमातिष्ठद् गुरुपूजने । अस्त्रे च परमं योगं प्रियो द्रोणस्य चाभवत् ॥ २० ॥ अतः वे वारुणास्त्रसे तुरंत ही अपना कमण्डलु भरकर आचार्यपुत्रके साथ ही गुरुके समीप आ जाते थे, इसलिये आचार्यपुत्रसे किसी भी गुणकी वृद्धिमें वे अलग या पीछे न रहे। यही कारण था कि मेधावी अर्जुन अश्वत्थामासे किसी बातमें कम न रहे। वे अस्त्रवेत्ताओंमें सबसे श्रेष्ठ थे। अर्जुन अपने गुरुदेवकी सेवा-पूजाके लिये भी उत्तम यत्न करते थे। अस्त्रोंके अभ्यासमें भी उनकी अच्छी लगन थी। इसीलिये वे द्रोणाचार्यके बड़े प्रिय हो गये ॥ १८–२० ॥ तं दृष्ट्वा नित्यमुद्युक्तमिष्वस्त्रं प्रति फाल्गुनम् । आहूय वचनं द्रोणो रहः सूदमभाषत ॥ २१ ॥ अन्धकारेऽर्जुनायान्नं न देयं ते कदाचन ।